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Showing posts from September, 2023

प्रेम से सुंदर नहीं कोई अहसास(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

प्रेम भरा हो तेरा संसार(( दुआ बुआ स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

अ __नन्त गगन से हों ऊंचे सपने, धरा सी शीतलता रखना बरकरार ना__ राज नहीं हैरान हैं हम, किस्मत बना देती है जोड़ी सात  समंदर पार य__ह पल है जश्न के आगाज का, बना दो इस लम्हे को यादगार एक दुआ है हम सब की ओर से, हो प्रेम भरा दोनों का सुंदर संसार स___लामत रहो,खुश रहो, विविध हैं हम विभिन्न नहीं, प्रेम ही जीवन का आधार

अपने तो अपने होते हैं(( दुआ बुआ स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

अ_____ पने तो अपने होते हैं  सदा देते हैं प्रेम का उपहार ना_____  छोड़ें कभी साथ उनका,  दुआओं भरा उनका संसार य_____ ह पल है उत्सव का  बना दो उसे तुम यादगार स_____ लामत रहो,खुश रहो प्रेम ही जीवन का आधार

प्रेम से सुंदर कोई अहसास नहीं

प्रेम ना जाने मजहब कोई(( दुआ बुआ स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*प्रेम ना जाने मजहब कोई, जाने ना प्रेम कोई  जाति,भाषा, देस की दीवार* *प्रेम तो दस्तक है दिल की  दिल पर, प्रेम ही हर रिश्ते का आधार* *एक दुआ है ईश्वर से आज जीवन में मिलें खुशियां अपार* *प्रेम चमन में अंकुर प्रेम के ही उगते हैं प्रेम से सुंदर हो जाता है संसार* *आज जन्मदिन पर आपके देता है दिल यही उपहार* *मतभेद बेशक हो जाए पर मनभेद ना हो कभी, आए ना चित में कोई विकार* *प्रेम से पहले आता सम्मान है हो ना रेखा ये कभी पार*  GOD BLESS YOU DEAR 

एक ही वृक्ष

एक ही वृक्ष के हैं हम फल,फूल,पत्ते,कलियाँ,अंकुर और हरी भरी शाखाएँ,विवधता है बेशक बाहरी स्वरूपों में हमारे,पर मन की एकता की मिलती हैं राहें, हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई, हैं सब आपस में भाई  भाई,एक खून है,एक ही तन है,इंसा ने ही है ये जात पात बनाई,वसुधैव कुटुम्बकम की भावना काश की हमने होती अपनाई, फिर ना बनाता जश्न कोई किसी की मौत का,न हमने सरहद समझी होती परायी,जीयो और जीने दो के सिद्धांत की,क्यों नही हमने घर घर अलख जलाई,आतंकवाद का हो जाये  खात्मा,ईद दिवाली हो सब ने संग मनाई,सुसंस्कारों की घुट्टी पीले अब हर इंसा, बदल दे अपनी सोच की राहें, धरा बन जायेगी स्वर्ग फिर बंध,ूअपने लाल को खो कर किसी माँ की नही निकलेंगी आहें,एक ही वृक्ष के हैं हम फल,फूल,पत्ते और हरी भरी शाखाएँ

जन्नत की ना करी कभी मन्नत

ना शोक ना संताप

ना शोक ना संताप न रूदन ना विलाप ना हूक ना मलाल ना जवाब ना सवाल तेरा चरित्र तो है अनुकरणीय *गजब तेरा व्यक्तित्व, अदभुत तेरा ख्याल* प्रेरणापुंज तूं जाने कितनों का ही,आचरण तेरे की दुनिया देगी मिसाल

सेवानिवृति पर ढेर बधाई प्रीती जी

*दुआओं का उपहार हो गर शामिल* कोई भी अवसर फिर आम से अति खास बन जाता है* प्रीति जी! आपको बखूबी आता है प्रीत निभाना, आज आप का जाना आंख नम कर जाता है* *राजनीति पढ़ाई आजीवन, पर की नहीं कभी राजनीति रिश्तों में भी,और शिक्षा क्षेत्र में भी, आपका सौम्य व्यक्तित्व सबको बहुत ही भाता है* माना जीवन का *स्वर्ण काल* हम कार्य क्षेत्र में बिताते हैं पर शेष बचा जीवन भी होता है *हीरक काल*ये अक्सर भूल जाते हैं आने वाला हर लम्हा रहे खुशगवार आपका, दिल मेरा यही गुनगुनाता है पल,पहर,दिन,महीने,साल कर दिन एक दिन सेवानिवृति का आ ही जाता है।। *खास नहीं अति अति खास होता है ये दिन जीवन में, यही समझ में आता है* *अब ना समय का बंधन होगा, अपने सपनों को पंख लगाना* *रह गया हो जो भी शौक बाकी उस पर अपना समय लगाना* *कभी कभी याद कर लेना हमको भी , देखो हम को भूल न जाना* *बहुत भली सी है मुस्कान आपकी, यूं हीं आजीवन मुस्कुराना*

कर्म

कर्मो की खुद ही होती है एक मधुर,सश्क्त सी जुबान,नही पड़ती ज़रूरत उन्हें शब्दों की,कर्म ही बन जाते हैं उनके अस्तित्व की पहचान,ऐसे ही कर्मो की कुदाली माँ नेे मेहनत के खेत में चलाई थी,सफलता के अंकुर फूटे उस खेत में,माँ हर शाम तेरी याद आयी थी,तेरे बारे में कुछ कहना है सूरज को दीप जलाने के समान, पर कहेंगे और याद करेंगे तुझे,है तुझ से ही हमारी पहचान

भगत सिंह के अमर विचार(( कोशिश स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*उम्र छोटी पर कर्म बड़े* गहरी सोच और खास विचार *व्यक्ति मरता है, विचार नहीं जान गया सारा संसार* *भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान  लोगों में देश भगति भाव का पहनाया परिधान*  बहुत जोश भरे हैं उनके  कई प्रेरक नारे और प्रेरक विचार *इंकलाब जिंदाबाद* है सबसे लोकप्रिय नारा उनका, जाने ये सारा संसार* 116 वीं जयंती आज भगत सिंह की, मर कर भी अमर हैं उनके विचार 28 सितंबर 1907 को बंगा पंजाब में हुआ था उनका जन्म, हुई धन्य धरा और धन्य हुआ ये संसार 23 मार्च 1931 को लाहौर की सेंट्रल जेल में  सजा ए मौत मिली,  हुआ शहीद भारत माता के गले का हार # जिंदगी चलती है अपने ही दम पर दूसरे के कांधों पर तो जनाजे उठाए जाते हैं# ऐसे भगत सिंह के अमर विचार जिंदगी को ले कर, जन जन की रूह को भाते हैं# #प्रेमी पागल और कवि का एक ही चीज से होता है सृजन कितनी गहरी बात कह गए भगत सिंह, एक बार तो कर के देखो मनन# #एक क्रांतिकारी के दो अनिवार्य गुण आलोचना और स्वतंत्र विचार जैसे तप तप सोना बनता है कुंदन, ऐसा भगत सिंह की सोच का संसार# #मैं मानव हूं,मुझे मतलब है उससे जो मानवता को प्रभावित करता है कितना गहरा ता

भगत सिंह जयंती(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

प्रेम प्रेम सब करें(( जन्मदिन की दुआ स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

प्रेम प्रेम सब करें,प्रेम न जाने कोय प्रेमवृक्ष की नन्ही डाली का आज जन्मदिन होय।। प्रेम ही राज है चारु चितवन का, प्रेम से सब कुछ स्नेहमय सा होय।। प्रेमभरी हर बात लगती है आली कितनी सुहानी प्रेम नहीं जिस चित में पल्लवित, वो भी नहीं कोई जिंदगानी पावनी सी बयार बह जाती सर्वत्र है,सब का जिया सुमन सा होय।। इंदु चमक रहा अनन्त गगन में, जैसे बड़े जोश से कोई परी स्वपन हिंडोले सोय।। माँ सावित्री की कृपा से, यथार्थ सपनो से आलिंगनबद्ध होय।। आनंद प्रकाश पसार रहा है अपनी लम्बी बाहें दुआओं का ही मौसम है आज, सो जाएं सब आहें।। सुहानी सी हों लाडो तेरे जीवन की सब राहें कथनी में ही नहीं,दिल से हम सब ये चाहें प्रेम ही जीवन का आधार है, प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम प्रकाश है प्रेम अनंत है प्रेम है तो कहां अहंकार है???

आज जन्मदिन है जिनका

आज जन्मदिन है इनका, आए इनके जीवन मे सदा बहार, मिले खुशी,सफलता,सुख,समृद्धि और मिले हम सब का प्यार, रोहिल्लास और कुमार्स की नन्ही कली तुम, तुमसे घर का आँगन गुलज़ार करते थे,करते है,करते रहेंगे तुम्हे प्यार हम सब बेशुमार, एक गुजारिश है ईश्वर से, शिक्षा संग मिलें तुम्हें संस्कार कबूल करो आज दुआएँ हमारी, देखो दुआओं से बड़ा नहीं उपहार देख तुम्हारी मोहिनी सूरत, स्नेह का होता है संचार करता है मन करें प्रकट, ऊपरवाले का आभार आयी जो तुम आँगन में हमारे, समा हो गया गुलज़ार महकती रहना,चहकती रहना, प्रेम ही जीवन का आधार सबसे बड़ी नेहमत यही होती है ईश्वर की, पनपे ना चित में कभी अहंकार *बेगाना भी बन जाता है अपना बस हो मधुर बोली और मधुर व्यवहार* समय तो निश्चित रूप से लेगा अँगड़ाई, कभी पनपे न कोमल चित्त में कोई कुविकार ओ मेरी लाडो बिटिया रानी! खिले ऐसा पौधा मन मे तुम्हारे, जाने जो करुणा,सहयोग,अहिंसा और परोपकार सुख,स्मृद्धि और सफलता फिर निश्चित ही देगी दस्तक जिंदगी के द्वार लेखनी ने तो कह दी दिल की, बस कर लेना इसको स्वीकार।।

सेवा संग मुस्कान,यही हमारी पहचान(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*सेवा संग मुस्कान यही निगन की पहचान* *समाधान हेतु आगमन संतुष्टि सहित प्रस्थान* *आए जब भी प्रांगण में  ग्राहक हमारे, मिले उसे उसकी समस्या का समाधान* *देकर त्वरित और त्रुटिरहित सेवा उसे भरोसे,विश्वाश आश्वाशन का पाएं इनाम* *ग्राहक है तो है संस्था हमारी महान* *वो नहीं हम निर्भर हैं उस पर इस सत्य से ना रहें अनजान* *ग्राहक ही है सर्वोपरि  दें जीवन में उसे यथोचित स्थान* *समाधान हेतु आगमन, संतुष्टि सहित प्रस्थान* *सरल सहज आत्मीय वार्तालाप हो संग ग्राहक के, उसकी जरूरतों से न रहें अनजान* *जिस काम के लिए आए वो प्रांगण में हमारे, सिद्धि का उसे मिले प्रावधान* *समाधान हेतु आगमन,संतुष्टि सहित प्रस्थान* *नई चुनौतियां,नए संकल्प हैं आज के समय में समक्ष हमारे* *छीन ना ले कोई हमारे ग्राहक को, आए बार बार वो हमारे द्वारे* *इसी संकल्प को धार कर हम, हर चुनौती को करें आसान* *सेवा संग मुस्कान यही निगम की सच्ची पहचान* *समाधान हेतु आगमन संतुष्टि सहित प्रस्थान*

कोमल हो कमजोर नहीं(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*कोमल हो कमजोर नहीं* इस सत्य को लो भली भांति जान *हौंसले बुलंद हों,लक्ष्य सधा हो* फिर मुट्ठी में होता है जहान  *आकर्षणों के बादल निश्चित ही चारों ओर छाएंगे घनेरे* *सही चयन लाता है उजियारा, गलत लाता है जीवन में अंधेरे* कभी ना लांघना लक्ष्मण रेखा वरना जीवन में मच जाएगा घमासान सीखना मर्यादा रघुनंदन से, माधव से सीखना गीता का ज्ञान शबरी से सीखना धीरज धरना राधा से सीखना प्रेम की आन लक्ष्मीबाई से सीखना योद्धा बनना करना सद्गुणों का आह्वान *दिल दिमाग का रहे ताल मेल सदा फिर हर समस्या का मिल जाएगा समाधान* *कोमल हो कमजोर नहीं, इस सत्य को लो भली भांति जान* *आजादी का मतलब कभी नहीं होता करें हम अपनी मनमानी* *चरित्र हमारा नेक पाक हो, फिर बहुत कुछ देती है जिंदगानी* *कर्म ऐसे हों जो सोच कर करें ऐसा ना हो कर्म करने के बाद अधिक ही सोचना पड़े, बने ना कभी हम नादान* *समस्या हैं जीवन में तो हैं संग में समाधान*

क्या भूलूं क्या याद करूं मैं

क्या भूलूं क्या याद करूं मैं सागर सी गहरी तेरी गहराई कौन सी ऐसी भोर सांझ है जब ना हो तेरी याद आई???

कई बार

कई बार हम बहुत पास हो कर  भी बहुत दूर होते हैं, और कई बार बहुत दूर होकर भी बहुत पास,सारा खेल सोच का है,हमारी सोच में,हमारी प्राथमिकताओं में कोई कितना ज़रूरी है,इसके चयन का विकल्प खुदा ने हमे दिया है,दुर्योधन गोविन्द का शांति प्रस्ताव मान लेता,मात्र पाँच गाँव पांडवों को दे देता,तो महाभारत का युद्ध न होता,रावण राम द्वारा भेजे गए शांतिदूत अंगद की बात मान लेता,तो इतना बड़ा युद्ध न होता,विकल्पोंं का चयन ही भाग्य निर्धारित करता है,ऐसे में विवेक के सहारे की ज़रूरत होती है,उसे काम में लेना चाहिए

मलाल और दुख

मलाल ने एक दिन कहा दुःख से,मुझ में और तुझ में क्या भेद है,आज मुझे तुम ये बतलाओ,क्यों समझ नही पाते लोग अंतर हमारा,आज मुझे ये अंतर समझाओ,दुःख ने कहा,सुनो बंधु, खो देते हैं जब हम अपनी कोई नायाब सी चीज,तब लोगों को मेरी अनुभूति होती है,मोह है कारण मेरा,ज्ञान की कमी यहां पर होती है,अब तुम दो मुझे परिचय अपना,बताओ क्या मतलब होता है मलाल का,क्यों पछतावे की गंध तुझ में होती है,मलाल से भर कर जब बोला मलाल तो दुःख को मायने मलाल के समझ में आ गए,क्यों मलाल है मलाल, क्यों दुःख के बादल उसपर छा गये,मेरा परिचय है काश,काश मैं यह कर लेता,काश में वो कर लेता, काश मैं दो मीठे बोल बोल लेता,आत्ममंथन होता है जब जन्म मेरा हो जाता है,मेरे जन्म की देरी के कारण इंसा चैन नही  पाता है,मेरा परिचय है,कर सकता था,पर किया नही,मेरा स्वरूप बड़ा विचित्र है,काश मैं समय,समर्पण ,धन से मदद कर देता,यह हूँ मैं, मैं ताउम्र नही मिट पाता, व्यक्ति के  साथ ताउम्र रहता हूँ,यही मेरी सज़ा है,दुःख तुम्हे कम किया जा सकता है,पर मुझे नही।।

भारत का चंद्रयान मिशन(( स्नेह प्रेमचंद))

*संकल्प से सिद्धि तक के सफर में सही सोच,अथक प्रयास,परिश्रम, संघर्ष,प्रतिभा हैं शुमार* *सपने वे होते हैं जो हमें सोने नहीं देते, बस सपनों का हो बड़ा आकार* *आज नहीं तो कल हो जाएंगे पूरे, बस माने ना जीवन में हार* उपरोक्त पंक्तियां भारत के चंद्रयान मिशन पर अक्षरश: लागू होती हैं। अब्दुल कलाम की पंक्तियां भी सौ फीसदी सत्य हैं कि *सपने वे हैं जो हमेंसोने नहीं देते* धरा पर संकल्प ले कर गगन में साकार करने की क्षमता हमारे भारत देश में निसंदेह है।पूरा विश्व अब मान भी गया है।असफलता  भी सफलता की डगर है,इससे बिखरे नहीं निखरें हम,यही चंद्र यान मिशनों ने सिखाया है।। *भारत का चंद्रयान मिशन १* अटल इरादे वाले हमारे भूतपूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपई जी ने 2003 में चंद्रयान कार्य की घोषणा की थी।दूरगामी सोच वाले अटल जी ने *सोच कर्म परिणाम* की ऐसी निर्बाध त्रिवेणी बहाई जिसने संकल्प को सिद्धि की राह दिखा दी।नवंबर 2003 में भारत सरकार ने पहली बार भारतीय मून मिशन के लिए इसरो के चंद्र यान 1 को मंजूरी दे दी थी। 5 साल बाद भारत ने 22 अक्टूबर 2008 को श्री हरिकोटा के *सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र*से

भारत मां का सच्चा लाल(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*संकल्प को मिल गई थी सिद्धि जब आपने परदेस की धरा पर कर किया कमाल* *जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लिया, ऐसा मां भारती का वीर लाल* *सुलगती,धधकती रही ज्वाला सीने में, जला दी सच क्रांति की मशाल* *आप सरीखे लालों की जग देता है आगामी पीढ़ियों को मिसाल* *मातृ भूमि का ऋण चुका गए आप, जोश जज्बा जुनून आप का अति कमाल* *आज बलिदान दिवस पर शत शत नमन और वंदन आपको, आपके व्यक्तित्व और कृतित्व ने मचा दिया धमाल*

संबंध नहीं मुरझाते कभी गर कायम रहे संवाद* (( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*संबंध नहीं मुरझाते कभी गर कायम रहे संवाद* *एक ही तो है एल आई सी सर्वत्र सर्वदा, हिसार हो या फिर हो फतेहबाद* *सुमन में तो खुशबू होती ही है, बस कर लेना हमें कभी कभी याद*  *यही दुआ है पूरी शाखा हिसार की,सदा खुश रहना और होना आबाद हंसते हंसते कट जाएं रस्ते, पनपे ना चित में कभी अवसाद* *मन मलिन न हो, राहें जटिल न हों हो ना कोई परेशानी,कष्ट,क्लेश,विषाद* *स्नेह भरा हो सफर आपका, हो ना जीवन में बाद विवाद* *खूब अच्छा काम किया, आगे भी करना, अपनी पैरेंटल शाखा को रखना सदा याद* *संबंध नहीं मुरझाते कभी,  गर कायम रहे संवाद* *खूब तरक्की करना जीवन में, यही ईश्वर से फरियाद*

भोर होते ही

सफर

सुकून और बैचैनी

सुकून और बेचैनी जब मिले किसी मोड़ पर,होने लगी दोनों में कुछ ऐसी बात,जिसे सुन कर सब ने सीखा कुछ न कुछ,उनका वार्तालाप औरों के लिए था सौगात,बेचैनी ने कहा,कैसे इतने शांत और मोहक हो तुम,आज बतलाओ मुझे इसका राज,मैं रहता हूँ सच्चे दिलों में,जहां लोभ,मोह,क्रोध और हिंसा का नही होता वास,जहां दर्द उधारे लेते हैं कुछ लोग,जहां सुख दुःख सांझे हो जाते हैं, जहां एक रोटी और चार जने हो,पर टुकड़े कर चार वो खाते हैं, माँ के आंचल में हूँ,पिता के प्रेम में हूँ,सच्ची आस्था में हूँ,मैं लेकर नही देकर खुश हो जाता हूँ,संचय में नही विश्वास है मेरा,में बाँट कर हर्षित हो जाता हूँ,मैं के स्थान पर हम को में अपने जीवन में ख़ास बनाता हूँ,यही राज है मेरे अस्तित्व का,आज ये सच्चाई मै आप सब को बताता हूँ,बेचैनी सिर्फ और सिर्फ सुकून का मुँह तकती रह गयी

जन्मदिन मुबारक माननीय नरेन्द्र मोदी जी(( बधाईस्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*उपलब्धियां बताती हैं  प्रयास कितने शिद्दत से किए गए हैं* *पहचान बताती है  व्यक्तित्व कितना दमदार है* *विकास बताता है  कितनी दूरगामी सोच है* *सिद्धि बताती है  संकल्प की क्या  गहराई थी* *विश्वपटल पर साख बताती है कूटनीति वाली राजनीति को अंजाम तक कैसे पहुंचाया जाता है* *बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना* कितनी महान साफ साफ कहती है ये बेटा बेटी एक समान  *जन धन योजना* से लाभान्वित हर वर्ग हो,यही इस योजना का मूल भूत आधार *वतन में सबको मिले बैंकिंग सेवाएं, सबको मिलें उनके अधिकार* *सांसद आदर्श ग्राम योजना* से बेहतर जीवन जी रहे हैं गांवों में किसान *मेक इन इंडिया योजना* का शुभ आरंभ है इस बात का परिणाम *भारत में ही उद्यमशीलता को मिले बढ़ावा,यही भाव इस योजना का इनाम* *नमामि गंगे* *सांस्कृतिक,आध्यात्मिक और आर्थिक महत्व है इस योजना का जो मोदी जी ने की थी आरंभ कितनी गहरी सोच,कितना सुंदर प्रारंभ* *18000गावों में बिजली पहुंचने का लक्ष्य है ठाना  भारतीय विकास को मिलेगी मजबूती,ऐसा मोदी जी ने माना* *भारतीय अर्थव्यवस्था की हुई देखो  तेज रफ्तार 7.4 अविश्वसनीय,अकल्पनीय,सच में उन्नति का सार* *खुश हाल भा

सच में

कितनी नादानियों को हमारी,माँ अपने दिल में सहजता से समा लेती है,कितनी भूलों को हमारी,माँ क्षमा का तिलक लगा देती है,कितने अपशब्दों को हमारे,माँ यूँ ही भुला देती है,हमारी इच्छाओं की पूर्ति हेतु,माँ अपनी ख्वाशिओं को बलि चढ़ा देती है,हमारे उज्जवल भविष्य हेतु,माँ अपना वर्तमान कर्म की वेदी पर चढ़ा देती है,माँ हमे क्या क्या देती है,क्या क्या करती है,शायद हम ये समझ भी नही पाते,पर हम माँ जो क्या देते हैं,ये विचार भी जेहन में लाने से हैं कतराते,कड़वा है,पर सच है

मां

मंजिल

मंज़िल मिले न मिले ,ये तो मुक़ददर की बात है। हम कोशिश भी न करें,ये तो सच मे बुरी बात है। अकर्म से तो बिन फल का भी ,कर्म अच्छा होता है। बेशक वांछित फल न मिले हमको,पर कोई न कोई फल उसमे छिपा होता है। आ जाता है जब समझ ये,समझो आयी भोर,बीत गयी रात है। मंज़िल मिले न मिले,ये तो मुक़ददर की बात है।।।।।।।।।।।।।

हिंदी है माथे की बिंदी(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

सखी

सखी  सखी री तुम यादबहुत आती हो आ-आकर यादों में, हमे बड़ा सताती हो, सखी री तुम याद बहुत आती हो।  ये कैसा रिश्ता है तुमसे जिसका कोई एक नाम नहीं कभी हो तुम मां जैसी, कभी हुई सहकर्मी सी,  कभी सखी तुम बन गयी और कभी घर जैसी ही सही।  दफ्तर खाली सा लगता है, गलियां सूनी सी हो गयी,  तेरे चले जाने से सखी, बाजार की रौनक भी खो गयी।  कितनी भी तुम दूर रहो, तुम्हें न भुला अब पायेंगे,  खुशी और गम के हर पल मे याद तुम्हें कर जायेंगे।  सखी तुम्हारे आंचल से मन की गहराई जुड गयी,  अब तो तुम इस दिल में हो,भले ही राहें मुड़ गयी।  हर पल अब तो लगता है, तुम होले से छू जाती हो,  सखी री तुम याद बहुत आती हो  आ-आकर यादों मे हमको बड़ा सताती हो सखी री तुम याद बहुत आती हो।

वही मित्र हैं(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

 राघव ने सुग्रीव से, माधव ने सुदामा से सच्ची मित्रता निभाई जब जब हुआ जिक्र दोस्ती का, दोनों की दिल से याद आई  *कह सकें हम जिनसे बात दिल की,वही मित्र हैं* स्नेह,सम्मान और स्थान जिन्हें देना आए,वही मित्र हैं *खामोशी की जो समझ लें जुबान, वही मित्र हैं* *हमारी जगह जो खुद को रख कर सोच सकें,वही मित्र हैं* *हर धूप छांव में जो संग खड़े हों, वही मित्र हैं* *जो हर राज़ का हो राजदार वही मित्र है* *स्नेह,सम्मान और स्पेस जिन्हें एक दूजे को देना आए,वही मित्र हैं* *मतभेद बेशक हो जाए पर मनभेद ना हो,वही मित्र हैं* *निरस्त न करके जो दुरुस्त कर दें, वही मित्र हैं*  *सलाह,सुलह,समर्पण की नींव पर बसा हो जो रिश्ता,वही मित्र हैं* *संवाद और संबोधन हो मधुर जिनका,वही मित्र हैं* *मजाक और कटाक्ष के मध्य की महीन रेखा का जो ध्यान रखें, वही मित्र हैं* *बिन किसी पूर्वाग्रह के जो किसी भी मसले पर निष्पक्ष राय रखें, वही मित्र हैं* *गलत को गलत और सही को जो सही कह सकें वही मित्र हैं* *हमारे गलत और बहकते कदमों को जो रोक सकें, सही राह पर ले जाएं,वही मित्र हैं* *विकारों का शमन और सद्गुणों का जो कर दें विकास,वही मि

और परिचय क्या दूं तेरा????(( विचार स्नेह प्रेम चंद द्वारा))

*साहित्य का आदित्य है तूं आर्यवर्त का है अभिमान* सरल,सहज,सुगम,बोधगम्य भावों का सुंदर परिधान और परिचय क्या दूं तेरा??? *तूं हीं राष्ट्र का गौरवगान* *हिंदी माथे की है बिंदी* विश्व पटल पर इसकी पहचान 11 स्वर और 33 व्यंजन इसके, अगणित शब्दों का करते गुणगान *एकता सूत्र में बांधे है हिंदी* *जनकल्याण का करे आह्वान* और अपरिचय क्या दूं तेरा??? *तूं हीं राष्ट्र का गौरव गान* *जन-जन की भाषा है हिंदी*  *सागर से गहरी भाव प्रधान*  *तेरे अस्तित्व से ही तो हिंदी  चमक रहा है हिंदुस्तान* *दिल पर दस्तक,जेहन में बसेरा चित में इसके पक्के निशान* और परिचय क्या दूं तेरा???? *तूं ही राष्ट्र का गौरवगान*  *हिंदी कविता की गहरी सरिता  हिंदी मनोभावों का सुंदर परिधान* *साहित्य का आदित्य है तूं,  आर्यावर्त का है अभियान*  और परिचय क्या दूं तेरा??  *तूं ही राष्ट्र का गौरव गान* *सहज,मधुर,भावानुकूल है हिंदी* *अनुराग की मधुर परिपाटी है हिंदी*  *सहजता की सौंधी सी माटी है हिंदी* *हृदय तल की गहराई है हिंदी*  *सत्यम शिवम सुंदरम की मधुराई है हिंदी*  *साहित्य जगत की अरुणिम आभा है हिंदी*  *दिल की निश्चल गंगोत्री से पावन

आज नहीं तो कल

आज नही कल,भुगतना पड़ता है कर्मो का परिणाम, पहले तोलो फिर बोलो,फिर न कहना क्यों हुए बदनाम।। अहंकार के चूल्हे में प्रतिशोध की ज्वाला को सतत  धधकाना नही होता ज़रूरी, किसी के रक्त से केश धो कर,आत्मा की ठंडक हो सकती है पूरी??? सोच कर्म परिणाम का जगत में बड़ा सरल सीधा सा नाता है, यह बात दूसरी है,यह सब को निभाना नही आता है।। काश द्रौपदी थोड़ा सोच कर बोलती अल्फ़ाज़, अंधे का पुत्र अंधा बोल कर बदले की आग का छेड़ दिया था सॉज।। आज भी उस सॉज की सिसकियां फिजां में देती है सुनाई, जब  भी ज़मीन दौलत पर होती हैं भाइयों में कहीं भी होती है कोई लड़ाई।। सोच कर बोलो,बोल कर मत सोचो,नही आता तो ज़ुबान को देदो विराम, वरना देर नही लगती,हो जाता है महाभारत का जगह जगह पर घमासान।। आज नही तो कल,भुगतना पड़ता है कर्मों का परिणाम।। काश पांचाली ने कभी कर्ण को स्वयंबर की सभा मे सूतपुत्र कह कर अपमानित न किया होता, इतिहास की धारा ही बदल गई होती,गांधारी का आँचल ममता से यूँ रिक्त कभी न होता।। काश द्रौपदी ने पांच पांच पतियों की पत्नी बनने का स्वीकार न किया होता फरमान, पार्थ की ब्याहता रहती बन पत्नी ही पार्थ की,जीवन उसका भी होता वरदान।। आ

आज नहीं तो कल

आज नही कल,भुगतना पड़ता है कर्मो का परिणाम, पहले तोलो फिर बोलो,फिर न कहना क्यों हुए बदनाम।। अहंकार के चूल्हे में प्रतिशोध की ज्वाला को सतत  धधकाना नही होता ज़रूरी, किसी के रक्त से केश धो कर,आत्मा की ठंडक हो सकती है पूरी??? सोच कर्म परिणाम का जगत में बड़ा सरल सीधा सा नाता है, यह बात दूसरी है,यह सब को निभाना नही आता है।। काश द्रौपदी थोड़ा सोच कर बोलती अल्फ़ाज़, अंधे का पुत्र अंधा बोल कर बदले की आग का छेड़ दिया था सॉज।। आज भी उस सॉज की सिसकियां फिजां में देती है सुनाई, जब  भी ज़मीन दौलत पर होती हैं भाइयों में कहीं भी होती है कोई लड़ाई।। सोच कर बोलो,बोल कर मत सोचो,नही आता तो ज़ुबान को देदो विराम, वरना देर नही लगती,हो जाता है महाभारत का जगह जगह पर घमासान।। आज नही तो कल,भुगतना पड़ता है कर्मों का परिणाम।। काश पांचाली ने कभी कर्ण को स्वयंबर की सभा मे सूतपुत्र कह कर अपमानित न किया होता, इतिहास की धारा ही बदल गई होती,गांधारी का आँचल ममता से यूँ रिक्त कभी न होता।। काश द्रौपदी ने पांच पांच पतियों की पत्नी बनने का स्वीकार न किया होता फरमान, पार्थ की ब्याहता रहती बन पत्नी ही पार्थ की,जीवन उसका भी होता वरदान।। आ

आज जन्मदिन है जिनका,आए उसके जीवन में सदा बहार(( दुआ स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*आज जन्मदिन है जिनका, आए उनके जीवन मे सदा बहार, करते थे,करते हैं, करते रहेंगे सदा इनसे प्यार* **मेरे घर आई एक नन्ही कली,बचपन मे एक नगमा अक्सर गुनगुनाती थी, सच मे मेरी सखी एक कली ही तो थी, जो सच मे जाने कहाँ से मेरे घर मे दौड़ी चली आती थी* समय का ऐसा घूमा पहिया, हौले हौले अहसासों में सखी समाई थी सुख हो या फिर दुख की बेला, वो कब नही घर मेरे आई थी???? रोज़ मिलन की कशिश थी मन मे, आने से उसके समा में बहारें आई थी, बेशक जगह से दूर हुए हैं,  पर मन का एक कोना घर उसके छोड़ कर आई हूं, प्यारी बिटिया,सखी,सहेली मेरी,एक तोहफा दुआओं का तेरे लिए मैं लाई हूँ, *एक पीहर और भी है तुम्हारा,यही समझ लेना उपहार* *खुशियां दे दस्तक सदा चौखट पर तुम्हारी,हों सपनो में भी तेरे दीदार* आज जन्मदिन है जिनका, आए उनके जीवन मे सदा बहार, बेहक वक़्त के पहिये ने कर दिया जुदा हमको, पर मन मे मिलन का आज भी रहता है इंतज़ार, आने से जिसके आए बहार,  गाती थी ये नगमा मैं जिसके लिए बारम्बार, जिससे मिलना ही होता था पर्व,उत्सव,तीज,त्योहार, एक दुआ है लाड़ो आज के रोज़,ज़िन्दगी करे तेरी सदा प्रेम का श्रृंगार, तुझसे रिश्ता है इतना गहरा,

सवाल

वैज्ञानिक से पूछा गया,सबसे बड़ा कोन?जवाब,ब्रह्माण्ड, भूगोलविद से पूछा गया,जवाब,जल थल नभ, गायक का जवाब था सुर और संगीत, कवि का जवाब था , कल्पनाशक्ति,प्रकृति L,सुनार का जवाब,सोना,फिलॉस्फर का जवाब,आवागमन का रहस्य,परमपिता की एकरूपता,बच्चे से पूछा गया,सबसे बड़ा कोन?बच्चे ने तपाक से उत्तर दिया,माँ,और कौन

पता ही नहीं चला,कब बीत गए 12 साल

पता ही नही चला, और बीत भी गए 12साल, पापा हमसे बिछड़े हुए, सुनाएं किसको अब  अपना  हाल??? एक सहजता  का आंगन बाबुल का कहलाता है, बच्चों की मुस्कान हेतु,वो उनकी हर परेशानी सहलाता है।। *होती है गर कोई परेशानी, पिता आगे बढ़ कर आता है* *नारियल सा होता है पिता  ऊपर से कठोर भीतर से नर्म ऐसा पिता बच्चों का नाता है* नही जगह ले सकता कोई मात पिता की,ईश्वर उनकी रूह को एक नए साबुन से ही नहलाता है, फिर भेज देता है पास हमारे,वो जन्मदाता पिता कहलाता है।। बरगद की घनी छाया है पिता, सबसे घना सुरक्षा साया है पिता, सहजता का पर्याय है पिता, बेटी का तो पीहर है पिता अपनत्व के मंडप में प्रेमअनुष्ठान है पिता, हर समस्या का समाधान,, हर सवाल का जवाब है पिता, मां का रौब,रुतबा,अधिकार है पिता माँ की तरह उसे प्रेम का करना नही आता इज़हार, ऊपर से कठोर, भीतर से नरम, वाह रे पिता का अदभुत प्यार।। *मैं हूँ न*कहने वाला होता है पिता, सबसे अच्छी जीवन मे राय है पिता, पता ही न चला,कब बीत गए 12 साल, कोई नही पूछता अब क्या है हमारे दिल का हाल। करबद्ध हम कर रहे परमपिता से यह अरदास, मिले शांति उनकी दिवंगत आत्मा को,है प्रार्थन

सेवानिवृति के बाद की जिंदगी भी बहुत खास है( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*माना जीवन का स्वर्ण काल हम कार्यक्षेत्र में बिताते हैं, पर शेष बचा जीवन भी होता है *हीरक काल* ये से क्यों भूल जाते हैं????? बहुत बड़ा और शीतल होता है साया बड़ों का, उनके साए तले हम कितने सुरक्षित हो जाते हैं।। *चलती फिरती अनुभवों की किताब होते हैं सीनियर्स हमारे* *इनके अनुभव हमें कितना कुछ  सिखाते हैं* *कुछ नहीं चाहिए बदले में इन्हें, बस मीठे बोल हमारे इन्हे खुश कर जाते हैं* *बहुत बड़ा हिस्सा जीवन का ये निगम के प्रांगण में बिताते हैं* *हैं पूरे सम्मान और प्रेम के ये अधिकारी, इनके नक्श ए कदम पर चल हम बहुत कुछ सीखे जाते हैं।। इनके सानिध्य से तो सहरा में गुलिस्तान बन जाते हैं हरे हो जाते हैं रेगिस्तान भी, जब ये किसी उत्सव का हिस्सा बन जाते हैं।।

युग जैसे बीते हैं मां जाई तुझ बिन ये दो साल

युग जैसे बीते हैं मां जाई! तुझ बिन लंबे ये दो साल लम्हा लम्हा बीत गए बेशक,  जाने हम ही हमारा हाल सीने में है एक खलबली जेहन में रहता है एक मलाल ऐसे कैसे चली गई तूं?? उठता रहता है एक सवाल *हानि धरा की लाभ गगन का* नहीं मिलता कोई तुझ सा पुर्सान ए हाल अभाव का प्रभाव ही बताता है कोई जीवन में कितना होता है खास यूं तो चलने को चल रही है जिंदगी, थी तूं जैसे तन में श्वास *एक ठंडी हवा का झोंका सी तूं तपते सहरा में आई थी* *आजमाइश तुझे आजमाती रही, फिर भी तूं मुस्काई थी* *उम्र छोटी पर कर्म बड़े, तन संग जैसे परछाई थी* *खुद मझधार में होकर भी साहिल का पता बताती थी* बोल मेरी मां जाई!प्यारी इतनी हिम्मत कहां से लाती थी?? *कर्म से मानी ना हार कभी, कर्म की नाव में चप्पू हौंसले के  चलाती थी* *मीठी बोली मधुर व्यवहार*  से सबको अपना बनाती थी *आज भी मधुर मधुर सी यादें तेरी,सीने में रखी हैं पाल* *युग जैसे बीते हैं मां जाई! तुझ बिन लंबे ये दो साल* *सोच कर बोला सदा* न गिला न शिकवा न शिकायत कोई, *सच तेरा वजूद था बड़ा कमाल* *बेगानों को भी बना लेती थी अपना, *कुशल प्रबंधन,अदभुत मिसाल* *प्रेरणा पुंज* कहूं तुझ

गुरु बिन मिले ना सच्चा ज्ञान(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*गुरु बिन मिले ना सच्चा ज्ञान गुण,दोष गुरु को होती पहचान* *गुरु पंखों को देता अनंत उड़ान गुरु शक्ति,गुरु भगति, गुरु समस्या का यथासंभव निदान*  ##सांदिपनी ऋषि और कृष्ण## *गोकुल ग्वाले को ऋषि सांदिपनी ने वेद उपनिषदों का दे दिया ज्ञान *युगपुरुष*बना दिया गुरु ने  शिष्य ग्वाले कृष्ण को, कण कण में आज भी कृष्ण महान *सकल विश्व में गूंज रहा आज भी गीता ज्ञान* *मोहग्रस्त अर्जुन,माधव विद्वान* कैसा तराशा गुरु ने शिष्य को, कर दिया विश्व का पुनरुत्थान  *कभी ग्वाला,कभी योद्धा,कभी रक्षक   नारी अस्मिता का कृष्ण महान *कभी सारथी,कभी रासरचैया अनेक रूप में अति धनवान* *मथुरा में  कंस वध के बाद  उज्जयिनी को किया था प्रस्थान जहां कृष्ण ने 64 दिनों में सीखी 64 कलाएं,अदभुत परिणाम *शायद ही ऐसा कोई  उदाहरण होगा जग में,ज्ञानी गुरु  शिष्य महान* *तराश दिया कान्हा को ऐसा ग्वाले से द्वारका धीश तक के सफर में,किया कान्हा का अदभुत चरित्र निर्माण* *गुरु बिन मिले ना सच्चा ज्ञान गुण दोष गुरु को दोनो की पहचान*

सबसे अच्छी शिक्षक मां

*सबसे पहली,सबसे अच्छी,सबसे शुभचिंतक,बहुत ही खास शिक्षक होती है माँ* *शक्ल देख हरारत पहचानने वाली होती है मां* *ज़िन्दगी का अनुभूतियों से परिचय कराने वाली,अहसासों को अभिव्यक्ति दिलाने वाली होती है माँ* *हर क्यों,कैसे,कब,कहाँ का सहजता से उत्तर देने वाली होती है माँ* *ज़िन्दगी की रेल की पटड़ी होती है माँ* *घर के गीले चूल्हे में ईंधन सी सुलगती रहती है मां* *दर्द छिपा रहती है मुस्कुराती कितनी अच्छी होती मां* *संस्कारों की घुट्टी पिलाने वाली,चेहरे पर मुस्कान लाने वाली होती है माँ* * माँ से बड़ा शिक्षक प्रेमवचन को तो नज़र भी नही आता,महसूस भी नही होता,आप को?

मां से बढ़ कर नहीं कोई शिक्षक

*शिक्षक दिवस*को मात्र अक्षरज्ञान देने वाले शिक्षक तक सीमित करना इसके अर्थ के साथ न्यायसंगत नही होगा ज़िन्दगी में जिसने भी हमे कुछ सिखा दिया,वही हमारा शिक्षक है,हमारे मात पिता, बुजुर्ग,बच्चे,मित्रगण,सहकर्मी,रिश्तेदार कोई भी,जो ज़िन्दगी का पाठ पढ़ा दे,हमारा शिक्षक है,सर्वत्र नज़र दौड़ा कर और आत्ममंथन के बाद प्रेमवचन को तो माँ से बड़ा शिक्षक नज़र नही आता,आप को आता है क्या????

रीढ़ निगम की अभिकर्ता(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

अ___भिकर्ता है रीढ़ निगम की, करते हैं सतत अगणित प्रयास हमारा अभिकर्ता हमारी शान है, खास नहीं हैं, ये अति अति खास भि__ न्न भिन्न हालातों से गुजरते रहते हैं कम नहीं होती इनकी इच्छा शक्ति और उल्लास क__ र्म का बजाते हैं सदा शंखनाद *कर्मण्येवाधिकारस्ते*आता है इन्हें रास र__ ण क्षेत्र नहीं छोड़ते कभी अपना,  कुशल योद्धा सा करते हैं सतत  विकास ता__ उम्र ना दिन देखते हैं ना रात देखते हैं,महकते हैं ऐसे जैसे पहुपन में सुवास *रीढ़ निगम की अभिकर्ता हर धूप छांव में करते प्रयास*

शिक्षक दिवस विशेष(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

शि--क्षा ही नहीं,  शिक्षक शिष्य को देता है संस्कार क्ष--मा कर देता है उसकी अनेकों गलतियाँ,  मकसद, उसका बस हो शिष्य  के जीवन में सुधार क---भी नही चाहता बुरा शिष्य का गुरु, दिनोंदिन कर देता उसका परिष्कार *हौले हौले आ जाता है उसके व्यक्तित्व में अदभुत सुधार* *गुरु का स्थान है गोविंद से भी ऊँचा  है,  गुरु, शिष्य के आदर और प्रेम का हकदार* *आज शिक्षक दिवस हमें सिखा रहा यही, शिष्य चित्त में आए न कभी अहंकार* *गुरु और सड़क हैं राही एक ही सफर के, बेशक खुद रहते हैं वहीं, पर शिष्य को  आगे बढ़ने का बना देते हैं हकदार।। *असली मायने शिक्षक के सार्थक हो जाते हैं जब वो हमारे भीतर जिज्ञासा,जिजीविषा,कर्मठता,लक्ष्य निर्धारण और प्रेरणा के गुणों का कर देता है संचार*  *मात्र अक्षर ज्ञान देने वाला ही शिक्षक नहीं होता, हो सकते हैं शिक्षक मात पिता,भाई बहन,मित्र,सहकर्मी और रिश्तेदार* *प्रलय और निर्माण* दोनों गोद में पलते हैं शिक्षक के, *सृजन और विध्वंस दोनों पर उसका अधिकार* *कच्ची माटी है शिष्य, शिक्षक कुम्हार दे सकता है मनचाहा आकार* *अथाह, अनंत,असीमित सागर सी संभावनाओं को खोज शिष्य में नित नित करता  श

सदा मुस्कुराती हुई

*सदा मुस्कुराती हुई* *अंतस में जाने क्या क्या छिपाती हुई* *रेगिस्तान को बसंत सा बनाती हुई* *ज्ञान गंगा चित में बसाती हुई* *कथनी नहीं करनी अम्ल में लाती हुई* *हर रिश्ते को स्नेह जल से सींच,अपना बनाती हुई* *हर किरदार बखूबी निभाती हुई* कब एक डिप्लोमेट की तरह हौले से जिंदगी के रंगमंच से निकल गई, पता ही नहीं चला पर तेरे जाने के अभाव के प्रभाव का बहुत अच्छे से पता चल रहा है।।

एक एक करके बना काफिला(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

**एक एक करके बना काफिला, कितना प्यारा ये परिवार** *जहां जनकल्याण ने सदा किया है कला,स्वच्छता,सौंदर्य का दीदार* *इस परिवार के मतवाले आ जाते हैं सार्थक करने अपना हर इतवार* *सोच,कर्म,परिणाम को ऐसी बहती है त्रिवेणी,आकंठ डूब जाते हैं हर बार* और अपरिचय क्या दूं उसका???? *है वो सिर्फ और सिर्फ हमारा प्यार हिसार*

maa

घर के गीले चूल्हे में,ईंधन सी जलती रहती है माँ,जाने क्या क्या सहती है,पर कभी कुछ भी नही कहती है माँ,घर की चक्की के दो पाटों में,गेहूं सी पिसती है माँ,समझौते का तिलक लगाती, उफ़ तक भी नही करती है माँ,कोल्हू के बैल की तरह करती रहती है कर्म वो,कैसे कभी नही थकती माँ,धरा से धीरज वाली,अनंत गगन से सपनों वाली,कर्म की सदा ढपली बजाती, मेहनत की कुदाली से अपने आशियाने को महकाती, जग में और कहीं नही मिलती माँ,,सच है न

धूप छांव सी इस जिंदगी में

*धूप छांव सी इस जिंदगी में रही तूं सदा बन के शीतल फुहार हरे हो गए रेगिस्तान जब भी हुआ मिलन तुझ से,पतझड़ में भी तूं बसंत बहार रोहतक से बर्लिन तक के सफर में कर्म,धीरज,स्नेह ही रहे तेरे सच्चा श्रृंगार*

सूरजमुखी से हो गए हैं रिश्ते

सूरजमुखी के फूल से  हो गए हैं रिश्ते जहां स्वार्थ की धूप खिले, वही तत्क्षण मुड़ जाते हैं बरसों पुराना पल पल का साथ, चंद ही लम्हों में भुलाते हैं माथा देख टीका निकलने वाले ये कैसे भूल जाते हैं अक्सर दौर बदल जाते हैं आज जहां है बहार ए बसंत, वहां पतझड़ भी तो आते हैं नजर से नहीं नजरिए से आंकलन होने लगा है,नहीं पता था दृष्टिकोण इतनी जल्दी बदल जाते हैं।। इतिहास दोहराया करता है अक्सर खुद को,फिर क्यों गलती दोहराते हैं गलती का तो होता है प्रायश्चित, गुनाह का होता है भुगतान यह सत्य क्यों भूले जाते हैं???? गया वक्त नहीं आता लौट कर, लम्हे की खता बन जाती है ना भूली जाने वाली दास्तान क्यों समझ नहीं पाते हैं??? सूरजमुखी के फूल जैसे हो गए हैं नाते, जहां स्वार्थ की धूप खिले, तत्क्षण वहीं मुड़ जाते हैं

आत्म मंथन और आत्म सुधार

बेटी है नेहमत ईश्वर की

और परिचय क्या दूं तेरा?????(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*भरोसे के मंडप में सुरक्षा का अनुष्ठान है एल आई सी* *विशवास की गागर में उम्मीद का जल है एल आई सी* *मैं हूं ना के भाव से लबरेज है एल आई सी* *एक लंबे साथ का हमसफ़र है एल आई सी* *सुरक्षा का अभेद्य कवच है एल आई सी* *प्रतिबद्धता,प्रयास,परिकल्पना की त्रिवेणी है एल आई सी* *एक सुखद आभास का अनहद नाद है एल आई सी* *सकारात्मक प्रतिस्पर्धा और परिवर्तनकारी दृश्टिकोण अपना कर विपणन के क्षेत्र में अग्रणीय है एल आई सी* *सुरक्षा, भरोसे,संवृद्धि, संरक्षा,आशा,उल्लास,मेहनत इन सातों रंगों का इंद्रधनुष है एल आई सी* *भरोसे और उम्मीद की ऐसी रंगोली है एल आई सी जो जीवन की भोर और साँझ, सुख और दुख में समानांतर खड़ी है* *विशवास की गीता में कर्म का शंखनाद है एल आई सी* *आशा के मानस में अडिगता की चौपाई है एल आई सी* *लोक कल्याण के वृक्ष पर विश्वाश का फल है एल आई सी* *अहम नहीं वयम की बयार चलती है जहां,वहीं रहती है एल आई सी* ऐसी एल आई सी का आज  67वा जन्मदिन है,तो हर्षित होने की बेला तो बनती ही है।।