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Showing posts with the label अस्तित्व

वजूद

धड़धड़ाती हुई ट्रेन से तेरे वजूद के आगे थरथराते हुए पुल सा मेरा अस्तित्व शायद सही से तेरे बारे में ना कुछ कह पाता हो भाव लिखने की मेरी कोशिश को शायद ये ज़माना समझ न पाता हो नजर और नजरिया सबके जुदा जुदा हैं किसी को चांद महबूबा सा सुंदर और किसी को चांद में भी दाग नजर आता हो प्रेम मापने का एक ही पैमाना मुझे आता है समझ, जब वो हो सामने कोई और नजर ना आता हो जैसे तूं रही सदा

शाख से अलग

तारे ज़मीन पर

भूल

वक़्त

हिन्दी का स्वरूप विचार स्नेह प्रेमचंद

जैसे नयनों में ज्योति

यादें

कितनी यादें जुडी हुई हैं माँ तेरेेअस्तित्व के साथ,सोच कर  सिरहन सी उठती है हिया में,ज़िन्दगी का अनुभूतियों से परिचय करवाने वाली का सर पर अब रहा नही हाथ।।

साहिल

पिता

पिता का अस्तित्व भानु जैसा होता है