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क्षमा मांगते हैं(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

क्षमा मांगती हूँ मैं धरा से,जो इंसान ने इतना प्रदूषण कर दिया। क्षमा मांगती हूँ मैं उन प्राणियों से,जिन्हें इंसान ने स्वादिष्ट भोजन समझ लिया।। क्षमा मांगती हूँ मैं हर उस मासूम बच्चे से,जिन्हें किताब न देकर असमय ही काम करने को मजबूर कर दिया। क्षमा मांगती हूँ मैं हर फुटपाथ पर कड़क जाड़ों और तपती धूप में सोने वालों से,जिन्हें हमने आशियाना न मुहैया कराया। क्षमा मांगती हूँ मैं हर उस नारी से,जिसका दामन समाज के बाशिंदों ने ही कलंकित किया।।

गम गूसार

हम जिन्हें समझते रहे