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वो कब याद नही आती

वो कब याद नहीं आती,भोर हो या हो फिर शाम, माँ होती ही ऐसी है सबकी, माँ का साया चारों धाम।। सहजता दामन चुराने लगती है,उसके जग से जाने के बाद, कभी कभी तो सच मे आती है वो बहुत ही याद।। हर शै कितनी जीवंत,कितनी सुंदर,कितनी आकर्षक होती है माँ के संग, माँ से ही तो सुंदर होते हैं जीवन के सारे के सारे रंग।। माँ वो सिलबट्टा है जो खुद पिस कर बच्चों के जीवन की मीठी चटनी बनाती है, कैसे भी हालात हों जीवन के,वो समस्या का समाधान बताती हैं।।