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जन्नत की ना कभी करी मन्नत((विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*जन्नत की कभी करी ना मन्नत जब तलक साथ था मां जाई और मां आपका* *जन्नत का दूजा पर्याय रही दोनों  ही,कितना मधुर और अपनत्व भरा साथ था आपका* *देख ली सारी दुनिया मैने नहीं मिला विकल्प दूजा आज तलक कोई आप का* *एक अलग ही माटी से बनाया था ईश्वर ने दोनों को सच में ही नहीं कोई सानी आप का*