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शिक्षक दिवस विशेष(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))


शि--क्षा ही नहीं, 
शिक्षक शिष्य को देता है संस्कार

क्ष--मा कर देता है उसकी अनेकों गलतियाँ, 
मकसद, उसका बस हो शिष्य  के जीवन में सुधार

क---भी नही चाहता बुरा शिष्य का गुरु,
दिनोंदिन कर देता उसका परिष्कार

*हौले हौले आ जाता है उसके व्यक्तित्व में अदभुत सुधार*

*गुरु का स्थान है गोविंद से भी ऊँचा है, 
गुरु, शिष्य के आदर और प्रेम का हकदार*

*आज शिक्षक दिवस हमें सिखा रहा यही,
शिष्य चित्त में आए न कभी अहंकार*
*गुरु और सड़क हैं राही एक ही सफर के,
बेशक खुद रहते हैं वहीं,
पर शिष्य को आगे बढ़ने का बना देते हैं हकदार।।

*असली मायने शिक्षक के सार्थक हो जाते हैं जब वो हमारे भीतर जिज्ञासा,जिजीविषा,कर्मठता,लक्ष्य निर्धारण और प्रेरणा के गुणों का कर देता है संचार*

 *मात्र अक्षर ज्ञान देने वाला ही शिक्षक नहीं होता,
हो सकते हैं शिक्षक
मात पिता,भाई बहन,मित्र,सहकर्मी और रिश्तेदार*

*प्रलय और निर्माण* दोनों गोद में पलते हैं शिक्षक के,
*सृजन और विध्वंस दोनों पर उसका अधिकार*

*कच्ची माटी है शिष्य,
शिक्षक कुम्हार दे सकता है मनचाहा आकार*

*अथाह, अनंत,असीमित सागर सी संभावनाओं को खोज शिष्य में
नित नित करता  शिक्षक सुधार*
*गुरु का मार्गनिर्देशन संवार देता है जीवन की राहें,बस हो शिष्य
 फरमाबरदार*

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