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सोचो,संवारो अपनी धरा को

SWARON DHRA KO.........socho,sanwaro apni dhra ko,ab aur na ho pryavaran ka hraas perdushan ger faila issi gti se,kaise hoga yhan jivan ka vaas,jal,dhwni,vaau,bhojan sbhi perdushit hein aaz kuch had se aage,kaise rhe shudh peryavaran hmara,jab kertayon se ham sab hein bhage,sanjhe se prayas hmare,vatavaran ko bna sakte hein khaas,socho,sanwaro apni dhra ko,ab aur na ho pryavaran ka hraas........aaz pryavaran diwas h 5 june.........

सहेजे सँवारे। poem by sneh premchand

सहेजेें सँवारे अपनी धरा को, और न हो अब इसका ह्रास । माँ तुल्य होती है धरा तो, मातृभूमि हमारी अति खास।। धरा पर रह जायेगा सब कुछ धरा, है सबको ये जानकारी। पर जब तक साँझ न आए जीवन की, करें हम धरा को स्वर्ग बनाने की तैयारी।। पर्यावरण का न हो अब हरण , हिंसा का बिगुल न कोई बजाए। *जीयो और जीने दो * की  सोच को, इस धरा पर सब अपनाएँ।। ऐसे ही तो सम्भव है सबका साथ सबका विकास । सहेजे सँवारे अपनी धरा को, और न हो अब इसका ह्रास ।।             स्नेहप्रेमचंद