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तुम पीपल से कहीं भी उगे रहे(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

तुम *तर्क विज्ञान का* मैं *हिंदी की पावन कविता* तुम लगे रहे सिद्ध करने में, मैं बहती रही बन कर सरिता तुम *पीपल* से कहीं भी उगे रहे मैं *केसर क्यारी* सी निज परिधि तक सीमित रही