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मजहब

मज़हब नही सिखाता  आपस मे वैर रखना एक ही वृक्ष के हैं हम सब फल,फूल,पत्ते और हरी भरी शाखाएं। विविध्ता है बेशक बाहरी स्वरूपो में हमारे,पर मन की एकता की मिलती है राहें। प्रेम की राह पर सब चल सकते हैं,गर सच्चे मन से ये चाहें। जाति, मज़हब,वर्ग भेद भुला कर,फैला दें हम सब अपनत्व भरी बाहें।