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एक कसक सी (थॉट बाय स्नेह प्रेमचंद)

नेहर। thought by snehpremchand

एक कसक सी उठती है अक्सर नेहर जाने की, जाने क्या सोच थम जाती है,शायद आबोहवा ज़माने की।।