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सखी

सखी  सखी री तुम यादबहुत आती हो आ-आकर यादों में, हमे बड़ा सताती हो, सखी री तुम याद बहुत आती हो।  ये कैसा रिश्ता है तुमसे जिसका कोई एक नाम नहीं कभी हो तुम मां जैसी, कभी हुई सहकर्मी सी,  कभी सखी तुम बन गयी और कभी घर जैसी ही सही।  दफ्तर खाली सा लगता है, गलियां सूनी सी हो गयी,  तेरे चले जाने से सखी, बाजार की रौनक भी खो गयी।  कितनी भी तुम दूर रहो, तुम्हें न भुला अब पायेंगे,  खुशी और गम के हर पल मे याद तुम्हें कर जायेंगे।  सखी तुम्हारे आंचल से मन की गहराई जुड गयी,  अब तो तुम इस दिल में हो,भले ही राहें मुड़ गयी।  हर पल अब तो लगता है, तुम होले से छू जाती हो,  सखी री तुम याद बहुत आती हो  आ-आकर यादों मे हमको बड़ा सताती हो सखी री तुम याद बहुत आती हो।

तूफान

अक्सर

अक्सर माँ याद आ जाती है खोलती हूँ जब कपाट अलमारी के, याद माँ की उभर कर आती है कहीं होती है जब बदलाव की इच्छा तब माँ की याद आ जाती है माँ से शुरू होती है दुनिया माँ पर ही सिमट सी जाती है कोने में पड़ा  बैग चिढ़ाता है अक्सर अब देखूं कहाँ ये जाती है नही सहजता और सुकून माँ सा  कहीं और अँखियाँ नीर बहाती है अक्सर माँ  याद आ जाती है बुनती हूँ जब कोई  फंदा मुझे माँ याद आ जाती है

दूर khin

जेहन से जाती हो

याद तो वो जब आए

जब याद किसी की आती है Thought by Sneh Premchand

जब याद किसी की आती है,दो आंसू फूट निकलते हैं,एक पीड़ा मन तड़फाती है,जब याद किसी की आती है,नही जग की कोई शै फिर भाती है,सब सूना सूना लगता है,एक कसक सी हिया में हलचल मचाती है,सहज होने की कोशिश ही फिर हम को असहज बनाती है,नैना बन जाते हैं लब हमारे,सिसकी सरगम गाती हैं,और ये याद जब किसी बहुत ही अपने और खास की हो तो?

*अक्षम्य अपराध* विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा

कुछ तो जग में

याद आ जाती है thought by sneh प्रेमचन्द

तूं याद आ जाती है

शफ़क thought by sneh premchand

मानो बहुत कुछ कहना चाहती है ये शफक बिन लफ़्ज़ों का इस्तेमाल किए।  बिन दीवाली ही जला दिए हो जैसे किसी ने दिवाली के अगणित से दीए।।            स्नेह प्रेमचंद

Poem on mother by sneh premchand

जब लगती है सांस घनी गहराने।  मां लगती है मुझे याद तो आने।।  पहले तुझसे मिलने के  बनाती थी मैं ढेर बहाने।।  तू नहीं तो तेरे एहसास तो हैं,  मां दिल में मेरे 16 गाने।।         स्नेह प्रेमचंद

जन्मदिन

जन्मदिन के दिन जन्मदेने वाले, अक्सर याद आ जाते हैं। ऊपर से भी वो दे रहे होंगे दुआ, एक अजीब सा सुकून उनके ज़िक्र में हम पाते हैं।। वे जाने क्या क्या करके,बिन जतलाए,हमें ऐसे मुकाम पर लाते हैं।। पर हम सही समय पर सही बात को कतई समझ नहीं पाते हैं।।        Snehpremchand

मां याद आ जाती है

तन्हाई जब करती है कोलाहल,तब माँ याद आ जाती है। आती हैं जब गर्मी की छुटियाँ,तब माँ याद आ जाती है। ढलती है जब साँझ सुनहरी,तब माँ याद आ जाती है। कौन सी ऐसी शाम है,जब माँ याद नही आती है। नही मिलता जब प्यार माँ सा कहीं,तब माँ याद आ जाती है। दुखा देता है जब कोई दिल,तब माँ याद आ जाती है। खोलती हूँ जब पट अलमारी के,तब माँ याद आ जाती है। माँ बाप ही एक ऐसा रिश्ता है जो किसी शर्त पर प्यार नही करता, हम उन्हें दुःख भी देते है, तो भी प्रेम करते है।

वो पुराना घर

वो पुराना घर मुझे आज भी सपनो में आ जाता है। जहाँ जीवन का परिचय हुआ था अनुभूतियों से, जाने क्या क्या मानस पटल पर छा जाता है।

भूलना

जिन्हें हम भूलना चाहें,वो अक्सर याद आते हैं। ज़िक्र होता है जब कहीं उनका,वो ज़ेहन में खुदबखुद छा जाते हैं।

अनहद नाद। thought by snehpremchand

कभी थालियों,कभी थालियों,कभी घण्टियों का बजता है अनहद नाद। कभी दीया आस का होता है प्रज्वलित, जैसे ज़िन्दगी के तरुवर को मिल गयी हो आशा की खाद।। वतन ही नहीं, माँ भारती के इस सच्चे सपूत को आनेवाली पीढियां भी रखेंगी याद।। उम्दा सी परिकल्पना ले जो चला संग दृढ़ प्रतिबद्धता के,कर सार्थक प्रयास किया जीवन  सबका आबाद।।               स्नेहप्रेमचंद

वो