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रूह ने एक दिन कहा तन से

रूह ने एक दिन कहा तन से,एक नियत समय के लिए बंधू होता है जग में तेरा बसेरा,तुझे तो ये भी नही पता,कब आ जायेगी साँझ जीवन की,कोण सा होगा तेरा अंतिम सवेरा,फिर भी मोह माया में रहता है लिप्त तू,करता है अपने माटी के पुतले पर गुमान,तेरी सुंदरता तो है चार दिनों की,है तू भी चन्द दिनों का मेहमान,कीचड़ में कमल की तरह साथी,क्यों तुझको रहना नही आया,अपने रूप और यौवन पर तू जाने कितनी बार इतराया,बार बार जा मुक्तिधाम भी,क्यों तुझ को सत्य समझ नही आया?रूह के तन से पूछे गए इस प्रश्न का जवाब क्या आप के पास है,कोशिश कीजिये

तिनका तिनका

संवेदना

सफर

चल रे कागा thought by sneh premchand

चल रे कागा दूर कहीं, जहाँ हो केवल प्रेम और करुणा  का सुंदर डेरा। ममता सुता और सौहार्द है बेटा जिनका,चलो वहीं करते हैं रैन बसेरा।।      स्नेह प्रेमचंद

सलाम

सलाम है उस घर आंगन को  जहाँ माँ बाप का होता है बसेरा। सलाम है उस ड्योढी को, अतिथि देवो भव भाव का होता है सवेरा। सलाम है उससे शांति कुंज को जहां क्लेश,द्वेष,न हो,न हो तेरा मेरा। सलाम है उस हर  चौखट को, जहाँ जाने कितने भूखों को तृप्ति का होता हो अहसास। सलाम है उस पावन कुटिया को जहाँ बहन,बेटी को मिले मान सम्मान की आस।।