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उठ लेखनी

उठ लेखनी आज कुछ ऐसा काम करेंगे भूखे सोते हैं जो मासूम, लोगों से उनके लिए कुछ करने को कहेंगे किसी को सूखी रोटी भी नही है मयस्सर,कोई छपन भोग लगाता है क्यों इतनी विषमता भरा है ये जग, क्यों इंसा आधी आधी रोटी नही खाता है बहुत सो लिए,अब तो जाग लो, हर समर्थ एक निर्बल का हाथ थाम लो,यही होगा सच्चा बैंक बैलेंस तुम्हारा,कर्म ऐसेतुम्हारी रिटर्न भरेंगे।

दे साथ लेखनी

दे साथ लेखनी,कुछ लिखेंगे ऐसा जो करेगा जननी को श्रद्धांजलि का काम। एक बिना ही जग लगता है सूना माँ है ईश्वर का ही दूसरा नाम।। वो कितनी अच्छी थी, वो कितनी प्यारी थी, वो हंसती थी वो हंसाती थी कभी शिकन  अपने चेहरे पर भूल से भी न लाती थी। बहुत परेशान होती थी जब तब बस माँ चुप हो जाती थी। न गिला,न शिकवा,न शिकायत कोई ऐसी माँ को शत शत हो परनाम। दे साथ लेखनी,कुछ लिखेंगे ऐसा करेगा जो जननी को श्रद्धांजलि का काम। भोर देखी ,न दिन देखा न रात देखी,न देखी शाम। घड़ी की सुइयों जैसी चलती रही सतत वो फिर एक दिन ज़िन्दगी को लग गया विराम। वो आज भी हर अहसास में जिंदा है बाद महसूस करने की नज़र चाहिए। है जीवन माँ का एक प्रेरणा बस प्रेरित हिने की फितरत चाहिए।। रोम रोम माँ ऋणि है तेरा ज़र्रा ज़र्रा करता है तुझे सलाम।।

उठ लेखनी(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

उठो लेखनी,चल कुछ ऐसा कदम उठाएंगे। जहाँ जहाँ हुआ है अन्याय,लोगों को याद दिलाएंगे।। द्वापर की द्रौपदी,सतयुग की सीता, कलयुग की दामिनी की कुछ कर के बातें सोई चेतना जगायेंगे।। क्या गलती थी पांचाली की,जो पांच पतियों के होते हुए भी भरी सभा मे निर्लज्ज हुई। क्या गलती थी पतिव्रता सिया की,जो निर्दोष होते हुए भी उसकी अग्निपरीक्षा हुई। क्या गलती थी उस अबोध दामिनी की,जब मानवता भी शर्मसार हुई। आज नही ये युगों युगों से संग नारी क ऐसा हीे होता आया है। ऐसे जाने कितने किस्सों में,इतिहास ने खुद को दोहराया है।। बहुत सो लिए,अब तो जागें,अब समय जागने का आया है। सर्वे भवन्तु सुखिना, क्यों इस भाव को जग ने नही अपनाया है????

उठ लेखनी