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कड़वा है मगर है सत्य

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शतक लगाना

लम्हे

कोई भी खास दिन और भी खास हो जाता है गर अपनत्व से भरे लोग साथ में हों हमारे सच्चा बैंक बैलेंस होते हैं सच्चे नाते,सच्ची दोस्ती, कहती हूं मैं सांझ सकारे कुछ लोग स्थाई सा निवास बना दिखाई देते हैं चित में, खंगाले जब भी अंतर्मन के गलियारे

महफिल

सजती है महफिल सदा अपनों के संग में होने से स्नेह सम्मान हो एक दूजे के लिए मन में,आते हैं करीब स्नेह की माला में अपनत्व के मोती पिरोने से

कड़वा है

विस्तार

बहुत छोटी है जिंदगी