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*हे राघव! फिर से आ जाओ आहत है इंसान* *खौफजदा हैं बालक तेरे, कर कृपा तू करुणा निधान* फिर जागा है रावण काम क्रोध का, जीना हुआ है सबका हराम कर दो मर्दन,जग करे क्रंदन, हुआ जैसे युद्ध भीतर कोई घमासान पीड़ा हर ले,निर्भय कर दे कर दे ना तू जग कल्याण खौफजदा है बालक तेरा, सुन ले ना अब तो भगवान श्रद्धा नहीं अब चित में शबरी सी, खोज लो चाहे जहान भगति में होती है सच्ची शक्ति, जाने ना इंसा नादान निर्मल चित नहीं कर पाता है, मलिनता का धरता है वह ध्यान भगति नहीं अब बजरंगी सी चित में जन के,भगति भाव बनाता हमें धनवान आए थे सीने में नजर तुम बजरंगी के, बड़े बड़े काज किए भक्तों के बजरंगी ने, ले कर राम तेरा ही नाम त्याग नहीं कोई करे केवट सा, चाहे मुक्ति का फिर क्यों दान?? *चित निर्मल तो कण कण तीर्थ चित निर्मल तो कण कण धाम* छोटी सी बात,पर है गहरी सी, जान ले ना इंसा नादान आए शरण ना कोई विभीषण सा फिर हो कैसे उसका कल्याण?? बने ना मित्र कोई विभीषण सा जग में, मित्रता का हो कैसे ज्ञान??? नारी अस्मिता के हो संरक्षक, है बड़ा आपसे,आपका नाम फिर से आ जाओ ना राघव कर दो ना अब जग कल्याण आए ...