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हो गहन राम की

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रामा रामा

फिर स्मरण करो निज शक्ति का

कर्मों से ही राम

अतिशय प्यारे

आभार

आभार राघव गाथा के सृजन में मुझे समस्त चराचर की शक्तियों का आभार प्रकट करना है जिन्होंने मेरे चिंत में राम भगति का अंकुर प्रस्फुटित किया और अपनी अनुभूतियों को मैं अभिव्यक्ति दे पाई, मुझे आभार प्रकट करना है मेरी दिवंगत बहन *अंजु कुमार* का जो बहुत बड़ी हनुमान भगत थी, एक चुंबकीय व्यक्तित्व की स्वामिनी,जिसका अंतर्मन हनुमान भगति से लबरेज था, तब से ही मन में राम जी पर लेखनी चलाने का विचार आया, आभार प्रकट करना चाहेगी *स्नेह लेखनी* अपने मात पिता और गुरूजनों का जिन्होंने अक्षर ज्ञान दिया, आभार प्रकट करूँगी मां सरस्वती का, जिनकी कृपा बिन कुछ भी संभव नहीं,आभार प्रकट करना चाहूँगी उन सभी आत्मीय जनों का,जिन्होंने मुझे निरंतर प्रोत्साहित किया और इस सत्कर्म को साकार करने की प्रेरणा दी,कुछ आभार पृष्ठभूमि में होते हैं जैसे नवनीत जी का जिन्होंनें मुझे घर में सदा ऐसा सृजनात्मक माहौल और सहयोग दिया कि *राघव गाथा* का जन्म हुआ, आभार मेरी बिटिया का जिसने इस किताब में मेरा दिल से साथ दिया,सच में यूँ ही नहीं लिखी जाती किताब,जब भी दिल से मैंने लगा कर देखा हिसाब तो बहुत से चेहरे मेरे जहन में आए, जिनके बहुत ही शीतल ...

अहोई अष्टमी विशेष(( विचार स्नेह प्रेम चंद द्वारा))

जब मां के बच्चे होते हैं तो  मन से कितने बेपरवाह से होते हैं कोई चित चिंता नहीं होती है  और नींद मज़े की सोते हैं याद आता है  अहोई अष्टमी का व्रत जब मां कितनी लगन से  हमारे लिए रखा करती थी ताई जी के यहां जा सुनती कहानी और जल का लौटा भरती थी अपनी दुआओं में मां सातों का भला चित में  धारण करती थी जैसे हमारे सुखद भविष्य के लिए कोई संकल्प सा चित में भरती थी मां की परवाह बता देती थी मां स्नेह कितना हम से करती थी किसी और नाते में ना कशिश है वह ना भाव है वह, मां तो ममता का सागर  अपने चित में भरती थी मां का कोई मुकाबला नहीं, मां धरा पर रह कर नभ को छुआ करती थी मुझे तो मेरी मां राम सी नजर आई सदा,जो नित नित संघर्षों से अकेले ही  जूझा करती थी चुनौती को अवसर बनाना आता था मेरी मां को, अभाव के किसी भी प्रभाव को कभी न चित में धरती थी हर परिस्थिति पर मनःस्थिति को कर हावी, पूरी प्रतिबद्धता से लक्ष्य की ओर पल पल बढ़ती थी *राम सा* सिद्ध कर दिया मां ने, *साधन और संसाधनों* से  महत्वपूर्ण * सच्ची साधना* है मां कभी उदासी  चित में नहीं भरती थी *राम ही राम प...