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गोबिंद

दे साथ लेखनी आज कुछ गोविंद का करेंगे दिल से बखान। पुनरोदय हो फिर से मेरे देस का,बने फिर से मेरा भारत महान।। नारी जाति की रक्षा हेतु,जैसे कान्हा आगे बढ़ कर आये। ऐसी भावना पैदा हो जाये गर समाज मे,मेरा समाज फिर स्वर्ग बन जाये। धर्म की रक्षा के लिए,दुष्टों के विनाश के लिए,साधु लोगों के भले के लिए,जो जो किया कृष्ण ने,है हम सब को आभास। शायद यही कारण है इतिहास में,कान्हा का व्यक्तित्व सूरज की भांति है बड़ा खास।। साहित्य के आदित्य से जगत में आलोक का आगमन होगा। कान्हा के जीवन करेगा मार्गदर्शन सबका,हर सवेरा फिर सुंदर होगा।।

नहीं ताकत

नहीं लेखनी में वो ताकत

न भाव सक्षम न शब्द समर्थ (( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

न भाव सक्षम है ना शब्द समर्थ है  जो तेरे व्यक्तित्व का कर पाएं बखान *विनम्रता,करुणा,स्नेह,अपनत्व, मधुर बोल,व्यवहार और ज्ञान* यही पता था तेरे घर का,यही रही तेरी पहचान।।  प्रेम सुता! तूं बड़े प्रेम से  पाठ प्रेम का जग को पढ़ा गई, कथनी में नहीं करनी में रहा विश्वाश तेरा, तूं जाने क्या क्या सिखा गई??? केंद्रबिंदु रही तूं हर अंजुमन का ओ मां जाई! खोज लेती थी तूं हर समस्या का समाधान। न भाव सक्षम हैं, न अल्फाज समर्थ हैं, जो तेरे व्यक्तित्व का कर पाए बखान।।

ना अल्फाज समर्थ ना भाव सक्षम(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

हर शब्द पड जाता है छोटा

नहीं शब्दों में वो ताकत

कह दिया