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गुलाबी शाम

हर शाम गुलाबी लगती है लगे प्रकृति ने सुरमई छटा हो बिखेरी सबकी साँझी है प्रकृति भेदभाव से दूर,न तेरी न मेरी।।           स्नेहप्रेमचंद