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संगीत

विरहनी आत्मा

संगीत

आत्मा

धन्य है धरा ये पावन सी

सूरज से मिलने

प्रकृति महक जाती है

गर प्रेम को प्रेम मिल जाए

सफल है जीवन

तलाश

मिले भी तो क्या मिले

दरिया thought by sneh premchand

बहुत दूर से आती है नदिया सागर से मिलन के लिए, इंसान ही है वो, जो जीए तो औरों के लिए भी जीए।।

कैसे जाऊं

कैसे जाऊं कान्हा के द्वारे,  कर रहे सुदामा मन में विचार। फटेहाल मेरा पहनावा है, क्या करेंगे कान्हा मुझे स्वीकार। मिले जब दोनों, लगा कर गले से  दूर कर दिए मलिन विकार।

बाराती

गगन धरा से मिलने को आतुर,गिरी शिखर बने हुए है बाराती, पंछी कलरव की शहनाई,कोयल भी मधुर सा नगमा गाती।।           Snehpremchand

चलो

चलो दूर कहीं अब चलते हैं जहां धरा गगन से मिलती है, वो देवों की ही तो भूमि है जहाँ प्रकृति पूरे यौवन में खिलती है।।

चलो दूर कहीं thought by snehpremchand

चलो दूर कहीं अब चलते हैं जहां धरा गगन से मिलती है, वो देवों की ही तो भूमि है जहाँ प्रकृति पूरे यौवन में खिलती है।।                 Snehpremchand

ज्ञान

विरहणी आत्मा जब मिल जाती है प्रीतम परमात्मा से,लोग उसे संज्ञा मौत की दे देते हैं, शौक का नही उत्सवबेला है ये,बाल गोबिंन भगत निजसुत के तन त्याजने पर पतोहू  को यही ज्ञान देते है।             स्नेहप्रेमचंद