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Showing posts from July, 2024

पाई पाई बचाते

मां जाई

खुशी नहीं मिलती बाहर से(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*खुशी नहीं मिलती बाहर से खुशी है भीतर का अहसास* *कोई तो कुटिया में भी खुश है किसी को महल भी नहीं आते रास* "सकारात्मक सोच से ही जीवन मे आती हैं खुशियां और उल्लास* *लेने में नहीं देने में मिलती है सच्ची खुशी, बस निर्मलता का हो चित में वास* *एक बात बस रहे जेहन में प्रलाप से बेहतर सदा ही होते हैं प्रयास*

धड़कन

जब धड़कन धड़कन संग बतियाती है फिर हर शब्दावली अर्थहीन हो जाती है फिर मौन मुखर हो जाता है ये दिल का दिल से गहरा नाता है जब संवाद खत्म हो जाता है फिर संबंध पड़ा सुस्ताता है कर्म ही असली परिचय पत्र होते हैं व्यक्ति का

सावन भादों(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

यूं हीं तो नहीं ये सावन भादों इतने गीले गीले से होते हैं जाने कितने ही अनकहे अहसास खुल खुल कर दिल से रोते हैं *आहत भाव* बन कर जज़्बात जैसे मन के मैल को धोते हैं कह नहीं पाते हम हर बात फिर होती है नयनों से बरसात नयन होते हैं आईना दिल का आते हैं नजर जिनमे जज़्बात

अतीत के गुल्लक

जन्मदिन पर

कड़वा है मगर सत्य है

रोशन से

दुख होता है

दुख जब होता है जब भीड़ में भी अकेले हों। जब बेगाने अपनो से अच्छे हों। जब अपनो को हमारी तकलीफ महसूस न हो।जब आप का कोई बहुत ही खास रहे ही न,जब आप को अपनी परेशानी बतानी पड़े,।

मेरी परछाई

अपने तो अपने होते हैं