Skip to main content

सच में दौर बदल जाते हैं(( विचार स्नेह प्रेम चंद द्वारा))

*सच में दौर बदल जाते हैं
कल तक जो आंगन था हमारा
वहीं मेहमान से बन जाते हैं*

*जहां लड़  जाते थे छोटी सी बात पर
अब बड़ी बड़ी बातों पर भी चुप्पी
साधे जाते हैं*

पहले मैं पहले मैं कहने वाले
पहले आप पहले आप के शब्द दोहराते हैं
शब्द रहें अपनी मर्यादा में,
गरिमा नातों की बनाते हैं
सच में दौर बदल जाते हैं
कुछ भी कहने वाले भाई बहन
सरहद के दायरे में सिमट जाते हैं
सच में दौर बदल जाते हैं

समय संग दबंग से मात पिता
बेबस,थके से नजर आते हैं
लड़खड़ाने लगते हैं उनके कदम,
खोजी नज़रों से सहारा खोजे जाते हैं
*संवेदनाएं सो सी जाती हैं*
द्वार उनके अक्सर वे खटखटाते हैं
कल तक थे जो जीवन में प्राथमिक
जिंदगी के रंगमंच पर,
नेपथ्य के पीछे हौले से चले जाते हैं सच में दौर बदल जाते हैं

अतीत के दस्तावेज होते हैं ये चित्र पुराने,
धूमिल यादों को स्मृति पटल पर ले आते हैं
याद आ जाते हैं गुज़रे ज़माने,
अतीत के झोले से जब वर्तमान में
कुछ पल चुरा कर लाते है 
सबसे सुंदर प्यारे पल लगते हैं वे,
जिन में मात पिता के अक्स नजर आते है 
सच में दौर बदल जाते हैं

Comments

Popular posts from this blog

वही मित्र है((विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

कह सकें हम जिनसे बातें दिल की, वही मित्र है। जो हमारे गुण और अवगुण दोनों से ही परिचित होते हैं, वही मित्र हैं। जहां औपचारिकता की कोई जरूरत नहीं होती,वहां मित्र हैं।। जाति, धर्म, रंगभेद, प्रांत, शहर,देश,आयु,हर सरहद से जो पार खड़े हैं वही मित्र हैं।। *कुछ कर दरगुजर कुछ कर दरकिनार* यही होता है सच्ची मित्रता का आधार।। मान है मित्रता,और है मनुहार। स्नेह है मित्रता,और है सच्चा दुलार। नाता नहीं बेशक ये खून का, पर है मित्रता अपनेपन का सार।। छोटी छोटी बातों का मित्र कभी बुरा नहीं मानते। क्योंकि कैसा है मित्र उनका, ये बखूबी हैं जानते।। मित्रता जरूरी नहीं एक जैसे व्यक्तित्व के लोगों में ही हो, कान्हा और सुदामा की मित्रता इसका सटीक उदाहरण है। राम और सुग्रीव की मित्रता भी विचारणीय है।। हर भाव जिससे हम साझा कर सकें और मन यह ना सोचें कि यह बताने से मित्र क्या सोचेगा?? वही मित्र है।। बाज़ औकात, मित्र हमारे भविष्य के बारे में भी हम से बेहतर जान लेते हैं। सबसे पहली मित्र,सबसे प्यारी मित्र मां होती है,किसी भी सच्चे और गहरे नाते की पहली शर्त मित्र होना है।। मित्र मजाक ज़रूर करते हैं,परंतु कटाक...

बुआ भतीजी

महिला(( नारी शक्ति पर बेहतरीन कविता स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

मजबूत हौंसला,बुलंद इरादे, आज की महिला की यही पहचान दिल पर दस्तक,दिमाग में बसेरा चित में इसके पक्के निशान महिला ही तो देती है जन्म सृष्टि को सच में ईश्वर का धरा पर है वरदान अपनी जान पर खेल हमें जगत में लाने वाली के लिए बहुत छोटा है शब्द महान जीवन की डगर आसान नहीं किसी भी महिला की, संकल्प से सिद्धि तक के सफर में कितने ही आते हैं व्यवधान पर वो रुकती नहीं है,चलती रहती है बेशक जानती नहीं परिणाम  अपने ही पर्याय को उतार   धरा पर बेफिक्र सा हो गया भगवान खास नहीं अति खास मूढ में रहा होगा  विधाता,  जब नारी का किया होगा निर्माण आज कोई भी क्षेत्र नहीं अछूता नारी शक्ति से, हर क्षेत्र में नारी ने बना ली है पहचान दिल दिमाग में सामंजस्य बिठाना आता है नारी को, सदा ऋणी रहेगा नारी का ये जहान