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Showing posts from 2026

अब मुझे लगने लगा है

अब मुझे लगने लगा है जिंदगी में बेटी से अजीज  कुछ भी तो नहीं, मन का हर कोना इस भाव से सजने लगा है अब मुझे लगने लगा है जिंदगी लंबी भले ही ना हो  पर बड़ी हो सफलता मिले चाहे ना मिले, कर्म तो करना ही है, मन मेरा सत्य यह कहने लगा है सही सोच से जैसे कीचड़ में कमल कोई खिलने लगा है अब मुझे लगने लगा है सुनने में भले ही अच्छा लगे बेटा हुआ है जीने में बेटी से प्यारा कोई एहसास नहीं, देख लो चाहे सारी दुनिया,बेटी से अधिक कोई दिल के पास नहीं अब मुझे लगने लगा है जिंदगी के एक मोड़ पर तो बेटी मां की भी माँ बन जाती है मित्र,सलाहकार,सारे ही किरदार बखूबी निभाती है अब मुझे लगने लगा है वह शिक्षा मात्र अक्षर ज्ञान है जिसके माथ पर सोहते संस्कार नहीं वह परिवार भी क्या परिवार है होता जिसमें प्यार नहीं??? अब मुझे लगने लगा है हर सपने को पूरा करने की पुरजोर कोशिश करनी चाहिए प्रयास ही तो हमें खास बनाते हैं अब मुझे लगने लगा है हर सफर मंजिल की ओर जाए ज़रूरी तो नहीं, पर मंजिल की ओर जाता कोई न कोई सफर ही है, इसलिए सफर करना तो जरूरी है अब मुझे लगने लगा है दोस्त अधिक हों ज़रूरी तो नहीं पर ज...

फिर मैं संगीतज्ञ होती जीजी

ललाट

ज्योति प्रेम की

ज़रूरी तो नहीं

उठो द्रौपदी

औरों से अलग था तेरा प्यार

जाने कहां चले गए हैं माधव

जाने कहां चले गए हैं माधव???? नहीं सुनते अब किसी द्रोपदी की करुण पुकार आखिर कब तक चलता रहेगा ऐसे, न्याय के होंगे कब दीदार??? सुनो द्रौपदी बहुत हुआ अब, अंधा गूंगा बहरा शासन प्रशासन अन्याय मत करो स्वीकार कोमल हो कमजोर नहीं विहंगम सोच को दो आकार गोविंद नहीं आयेंगे द्रौपदी बनो खुद ही शक्ति खुद की होने ना दो दामन दागदार सुरक्षा तो हर बाला का है जन्मजात अधिकार कब तक करेंगे हम इसका इंतजार नाव को डुबो रही देखो  नाव की ही पतवार धिक धिक धिक धिक  धिक धिक्कार  होता है जब असमत का चोला तार तार पूरी मानवता का होता तिरस्कार इतने आंसू बन जाए पारावार अजाब सा बन  जाता है जीवन लगने लगता सब बेकार आया समय अब लगे ऐसी फटकार फिर कोई सोच भी ना पाए हो ना कभी किसी का बलात्कार जब तक सोच में नहीं होगा सुधार पुनरावृत्ति होती रहेगी बार बार

मां जैसा कोई रंगरेज नहीं

हानि धरा की

हानि धरा की,लाभ गगन का

हो नहीं सकता

हरियाणा वाले

फिर से दहल गया है दिल्ली

फिर से दहल गया है दिल्ली क्यों पुख्ता नहीं होते इंतजाम?? तन आहत,रूह रेजा रेजा चमन बन गया रेगिस्तान शर्मसार,कलंकित हुई मानवता इंसान बन गया हैवान रौंदा,कुचला,मसला फिर किसी की अस्मत को,हैरानी भी होती हैरान सख्त सजा नहीं मिलती जब तक पुनरावृत्ति का होता काम जीवन पथ बना गया कोई अग्निपथ अति निंदनीय इस कुकर्म पर अब तो लग जाए विराम धरा का धीरज टूट गया अब रो रहा हो जैसे आसमान हर गली नुक्कड़ पर खड़े हैं रावण जाने कहां चले गए हैं राम??? जाने कहां चले गए हैं राम अब माधव भी नहीं आते सुन पुकार किसी की, कलयुग में काली घटनाओं का घमासान कैसे कोई दोषी घूम सकता है  सरे आम बहुत सो लिए,अब तो जाग ले ये आवाम चार दिनों की इस जिंदगी में हम धरा पर हैं मेहमान खुशी नहीं दे सकते किसी को,  कोई बात नहीं, पर कभी करें ना किसी को परेशान नहीं दिया हक विधाता ने हम को लाएं किसी के जीवन में कोई व्यवधान नारी तो रचती है सृष्टि,नारी से ही है यह जहान क्यों सो जाता है जमीर इंसा का, क्यों डोल जाता है उसका ईमान अपने भीतर के पशु को कर जागृत बन जाता है वह हैवान

खास नहीं बहुत खास है यह किताब

निंदा से निंदक कुछ नहीं

राम राम कहने से नहीं मिलते राम

आओ एक अनोखा अभियान चलाएं

सुन पार्थ मेरे मां थी माधव

मां से सुंदर कोई saaz नहीं

याद

बहुत याद आती है मां

एफ डी

बता पार्थ तेरे कौन है माधव

एक सवाल

वर्किंग है क्या तुम्हारी मां

चयन

जीवन का हर पल अपने भीतर कोई न कोई सीख छुपाए होता है। हम केवल मंजिल पर ध्यान देते हैं,जबकि असली ज्ञान उन रास्तों में मिलता है जिनसे हम गुजरते हैं।  सफर सुहाना हो तो मंजिल सुकून ही देती है सच में जिंदगी सफर ही तो है एक ऐसा सफर जो सब कर तो रहे हैं पर जानते बहुत कम लोग हैं कि यह सफर कैसा है इसलिए जीवन में वही राह चुननी चाहिए जो केवल बाहरी success न दे बल्कि भीतर उम्मीद भी जगाए और मन को शांति भी दे।ऐसी राह जहाँ डर कम और विश्वास अधिक हो जहाँ comparison नहीं, self-satisfaction हो, जहां कोई राग द्वेष ईर्ष्या अहंकार न हो कर मन में स्नेह धारा बहे क्यों कि अंत में इंसान को सबसे अधिक सुकून उसी जीवन से मिलता है जिसमें उसके निर्णयों ने उसके मन को अंधेरे नहीं बल्कि प्रकाश की ओर उन्मुख किया हो, एक बार श्री कृष्ण से कहा किसी ने आप तो भगवान हो आपने महाभारत का युद्ध कैसे होने दिया श्री कृष्ण का बहुत सुंदर सारगर्भित जवाब यह दुर्योधन का चयन था जो उसे विनाश की ओर ले गया,मैं तो शांति दूत बन शांति प्रस्ताव ले कर गया था जिसमें मात्र पांच गांव मांगे थे पर उसका जवाब था सुई की नोक के बराबर भी भूमि...

भावों से होता है अनमोल उपहार

मां कंठ हम आवाज

मां से बेहतर मां से मीठा होता ही नहीं कोई साज़ यूं हीं तो नहीं कहा गया मां कंठ हम आवाज

पूरा जहां

ओ नर्मदा

ओ नर्मदा क्यों बनी नहीं नर्म तूं क्यों इतने जीवन लील लिए क्रूज बना क्यों इतना क्रूर क्यों घाव सदा के लिए दिए

रौनक ए अंजुमन

पंचशील

रिजेक्ट नहीं करेक्ट