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Showing posts from 2026

मैं गंगा नगर हूं

रूह रेजा रेजा(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

रूह रेजा रेजा दिल तार तार अमानवीय घटना,मानवता शर्मसार कब तक चीर हरण होता रहेगा द्रौपदी का, कब तक आंचल होता रहेगा दागदार??? सबके घरों में हैं बहन बेटियां फिर ऐसी कुंठित सोच क्यों??  क्यों चित में इतने भयावह विकार कब आएगा रामराज्य कब होगी हर बाला सुरक्षित कब सही सोच को मिलेगा आकार??? चांद पर पहुंच गया है भारत पर अपनी बहन बेटियों को नहीं रख पाता सुरक्षित हर बार कभी कहीं कभी कहीं  नारी अस्मिता हो जाती है तार तार *भोग्या नहीं भाग्य है नारी* आखिर कब समझेगा यह संसार तभी लगती हैं आग कहीं कहीं सुनामी आती है बहन बेटियों संग जब होता है ऐसा प्रकृति भी कुपित हो जाती है हरी भरी फुलवारी को यह कौन बना गया रेगिस्तान क्यों इतना कामी हो गया प्राणी कब समझेगा वह नादान सही मायने में शिक्षा का अर्थ  तभी समझ में आएगा *सबकी बेटी हमारी बेटी*  यह भाव  जब चित में घर कर जाएगा

कहीं नहीं जाती मां

मां कहीं गई नहीं

नमन,वंदन,अभिनन्दन,चन्दन से डॉक्टर्स को

डॉक्टर्स डे

शौकीन थी मेरी मां

ना कभी हाथ छोड़ा ना साथ

जब जब

इतनी हिम्मत मेरी मां कहां से लाई

व्यक्ति विशेष थी मेरी मां

नीयत

फंदा फंदा

दौर

हर विषय में अव्वल मां

अंतस्थ की जान लेती है मां

क्या क्या सीखें मां से हम

हर समस्या का समाधान है मां(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

मां तो ऐसा विश्वदीप है जिसके आलोक से सम्पूर्ण जगत में फैला है उजियारा ध्यान से देखो ध्यान से सोचों क्या मां से अधिक कोई जग में है प्यारा????

मैने मां में यह सब देखा है(( भाव स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

music,art,litrature

मां जैसा कोई रंगरेज नहीं

पूर्ण नहीं सम्पूर्ण होती है मां

सफर सुहाना होता नहीं((स्नेह प्रेमचंद))

परिचय मेरी मां का

उजास

कैसे वृद्धाश्रम भर रहे हैं

भाग्य की बात

पिता कभी थकता नहीं(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा)

आपका नाम भी लिया काम भी लिया,आपसे सीखा सहजता और कर्मठता का सार तन्खाह तो तन ही खा जाता है अच्छा जीवन यापन करने के लिए कुछ और भी पड़ता है करना, कहते थे हर बार एक युग का अंत हो जाता है सच पिता के जाने के बाद सहजता दामन चुराने लगती है चित से जब भी पापा आते हैं याद जीवन जीया अपनी ही शर्तों पर पर कर्म करने से कभी मानी नहीं हार

जन्मदिन की बहुत बधाई(( दुआ बहन स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

लम्हा लम्हा बीत गए  जीवन के 65 साल समय समय पर जाने कितने ही बदले होंगे हालात और हाल समय अपनी गति से चलता रहा अपनी ही चाल  तू भी चलता रहा तू बढ़ता रहा गौरव हमारा बनता रहा,  हल करता रहा हर एक सवाल तू खुश रहे स्वस्थ रहे,हमारा भाई बड़ा कमाल क्लासिकल संगीत के प्रति अगाध प्रेम तेरा सच में बेमिसाल पाक कला में भी कर ली हासिल प्रवीणता,नातों को लेता है संभाल लहजे भले ही थोड़े तल्ख़ हैं तेरे, पर निर्मल चित है तेरा ओ मेरी मां के लाल जो सोचता है वही बोलता है दिल दिमाग दोनों में सामंजस्य रखता है हर हाल समय संग समझने लगा है प्रेम से बढ़ कर कुछ भी तो नहीं,प्रेम पुत्र रखने लगा है सबका ख्याल हम भी समझते हैं तुझ को भाई अपने जीवन की ढाल

संगीत

स्पर्श

प्रेम

तू बढ़ता चल