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सबके बस की बात नहीं

जाने क्या क्या सिखा गई

कान्हा चित में

कान्हा चित में

मां है तो चिंता फिर किस बात की

सावन में मल्हार सी

आभामंडल

कीचड़ में कमल सी

अच्छे से प्यार चला

तुझ जैसा कोई भी नहीं(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

स्नेह रंग

इंचीटेप

बहुत कुछ सिखा गई जग को

कभी खत्म नहीं होगी तेरी कहानी

पर्वों में दिवाली सी

आई नजर चित के हर गलियारे में

धन्य तूं धन्य तेरा शिल्पकार

और अधिक मुझे नहीं चाहिए था

निरस्त नहीं दुरुस्त

कभी रुकी नहीं कभी थकी नहीं