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भावों से होता है अनमोल उपहार

मां कंठ हम आवाज

मां से बेहतर मां से मीठा होता ही नहीं कोई साज़ यूं हीं तो नहीं कहा गया मां कंठ हम आवाज

पूरा जहां

ओ नर्मदा

ओ नर्मदा क्यों बनी नहीं नर्म तूं क्यों इतने जीवन लील लिए क्रूज बना क्यों इतना क्रूर क्यों घाव सदा के लिए दिए

रौनक ए अंजुमन

पंचशील

रिजेक्ट नहीं करेक्ट

रौनक ए अंजुमन

क्षणभंगुर

राम नाम की स्तुति

हर लम्हे को ऐसे जीयो

मां की वह तस्वीर

कॉर्निस पर सजी माँ की वह तस्वीर, जिसमें उनकी गोद में एक नन्ही सी दुनिया मुस्कुरा रही है  वह नन्ही बच्ची मैं ही थी जो वात्सल्य सुख पा रही है माँ की बाँहों का वह घेरा, मानो पूरी सृष्टि का सबसे सुरक्षित आसरा हो, जहाँ डर का नाम नहीं, बस स्नेह की गरमाहट थी सहजता थी सुरक्षा और अपनत्व था हम सब भाई-बहनों के  बचपन की वह तस्वीर आज भी दीवार पर नहीं,  दिल में टंगी है  अमिट, अनमोल, और सदैव जीवंत सदाबहार पुष्प के मानिंद समय बदल गया, हम बड़े हो गए, पर उस एक पल में माँ का प्यार आज भी वैसा ही ठहरा हुआ है  जब जब अतीत के झोले में झांकती हूं और खोलती हूं खिड़कियां तो  बचपन किवाड़ खोलने ऐसे आ जाता है जैसे किसी खिड़की से नृत्य करते धूलि कण एक ही कतार में ढलते दिनकर की चमक में नजर आते हैं अस्थाई से इस जीवन में मां स्थाई रूप से नजर आती है आज भी

मां जब तक है इस संसार में

रघुपति राघव राजा राम

प्रेमसुता

अनहद नाद

जलजात

अंत नहीं विराम

जलजात सी

कुछ लोग