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Showing posts from January, 2026

प्रेम हो जब परिवार में(( विचार स्नेह प्रेम चंद द्वारा))

*प्रेम हो जब परिवार में फिर क्या रखा है बाकी संसार में* *अपने तो अपने होते हैं रहते हैं हर पल सोच विचार में* हर धूप छांव में संग खड़े रहते हैं जानते हैं अंतर जिम्मेदारी और अधिकार में खामोशी की भी जुबान समझ लेते हैं अपने अपनत्व दिखा ही देते हैं हर किरदार में कई बार मुलाकातें नहीं होती जब और हो नहीं पाते संवाद फिर भी छू लेते हैं दिल हमारा, सच्ची खुशी मिलती है अपने ही परिवार में जगह से भले ही दूर हों पर दिल में रहते हैं सदा, आते हैं नजर हर आकृति आकार में प्रेम हो जब परिवार में फिर क्या रखा है बाकी संसार में

वो घर पुराना

वे फिर नहीं आते

विधि का विधान