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बहुत कुछ सिखा गई जग को

कभी खत्म नहीं होगी तेरी कहानी

पर्वों में दिवाली सी

आई नजर चित के हर गलियारे में

धन्य तूं धन्य तेरा शिल्पकार

और अधिक मुझे नहीं चाहिए था

निरस्त नहीं दुरुस्त