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तेरे न होने से एक कमी सी है(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

कहने को तो चल रही है जिंदगी
पर तेरे ना होने से एक कमी सी है

भले ही हंस बोल ले हम 
पर आंखों में एक नमी सी है

अभाव का प्रभाव बताता है 
कोई जीवन में होता कितना खास

मधुर संवाद और संबोधन दोनों रहे तेरे ऐसे जैसे तन में होती हो श्वास

तूं है नहीं,नहीं होता यकीन

डोलने लगता है विश्वाश

कुछ नहीं बहुत कुछ 
तेरा जीवन चरित्र सिखाता है

यह हम पर निर्भर है 
हमें क्या क्या सीखना आता है

कर्म और ज्ञान बदल सकता है भाग्य,
जो हमें फर्श से अर्श की ओर ले जाता है

क्या कुछ नहीं कर सकते प्रयास,

तुझे देख समझ में आता है

परिवेश परवरिश को कभी नहीं कोसा तूने,

निज प्रयासों से सच में इतिहास बदल जाता है

डॉक्टर होती तो भी कमाल ही होती,
विदेश सेवा में तेरा ओहदा आज भी याद आता है

आजमाइशें आजमाती रही तुझे पग पग पर,
पर तुझे हर चुनौती को अवसर बनाना आता था
अपनी क्षमताओं का करा भरपूर दोहन,अपने भीतर छिपे हनुमान को बखूबी बाहर निकालना आता था

गर्व से सीना चौड़ा हो जाता था हम सब का,जब भी जिक्र तेरा कहीं आता था

क्रम में सबसे छोटी पर कर्मों में बड़ी सबसे,

तेरा कद नित नित बड़ा हो जाता था

परायों को भी अपना बनाना

तुझे मां जाई आता था

चित निर्मल,चितवन भी चारु

चित्र,चरित्र तेरा
 तुझे भीड़ से अलग बनाता था

यह तो भाग्य नहीं सौभाग्य था मेरा,
जो तुझ से मां जाई का नाता था

अपने समय से बहुत आगे रही सदा तूं,तेरे exposure से तेरा व्यक्तित्व और भी निखर जाता था

*अजातशत्रु* कहें या कहें *निर्मल चित स्वामिनी* हर विशेषण तुझ पर सटीक बैठ जाता था

कभी करी ना निंदा किसी की

ओ रंगरेज!
 तेरे रंग में हर कोई रंग जाता था

अतीत के झोले से जब भी कुछ लम्हे चुराती हूं तेरा अक्स और उभर कर आता है

कथनी नही करनी में यकीन रहा सदा तेरा,
हर कृत्य तेरा यही बताता है

क्रिया की प्रतिक्रिया करो ना
 कभी उद्वेलित चित से,

तेरा यह कथन 
आज भी याद मुझे बहुत आता है

कैसे करेगा कोई यकीन कभी

तूं ऐसी थी

भला खुद मझधार में होकर भी कोई कैसे साहिल का पता बताता है

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