यूं हीं तू तो नहीं ये सावन भादो,
इतने गीले गीले से होते हैं।
जाने कितने ही दुखी से दिल,
जैसे इन दिनों फूट फूट कर रोते हैं।।
बहुत अच्छी लगती है मुझे ये बारिश,
इसमें भीगते भीगते कितना भी रो लो,नहीं किसी को होता भान।
बारिश संग बह जाते हैं अश्क भी,
और बरकरार रह जाती है आन।।
दर्द,प्रेम,खुशी,उल्लास हर भाव का
प्रतिबिंब है ये बारिश,
सब कुछ जैसे धुल सा जाता है,
जैसे सिया को रावण से मुक्त कराने आ गए हों राम।।
कभी अचानक सी आ जाती है बारिश,
फिर खिली खिली सी धूप आ जाती है।
ये क्षणिक आवेग होते हैं दिल के,
जो बरस कर फिर सहजता सी आती है।।
कभी रिम झिम सी आती है बारिश
जो बूंदा बांदी कहलाती हैl
ये होते है प्रभाव उन अनुभूतियों के जो,कटाक्षों,अपेक्षाओंऔर अपमान के गलियारे से गुजरती हैं,
और मन आहत कर जाती है।।
आते हैं जब ओले धड़ाधड़,
समझो, दुखी चित ने दुखों को चित से निकाला है।
हो जाती है दुखों की भी उल्टी,
पी हो, उसने जो दुखों की हाला है।।
कभी कभी जब लग जाती है झड़ी सी,
बरखा नहीं लेती रुकने का नाम।
ये लंबे समय से आहत मन का प्रतिबिंब है,
जैसे राधा से बिछड़ गए हों शाम।।
जाने कितने ही रुके आवेग बरसों के,
फिर बह निकलते हैं अविराम।।
कोई रोके ना,कोई टोके ना,
सजल नयनों को नहीं मिलता आराम।।
और जब आती है कोई बाढ़ सुनामी
समझो, बात हद से भी गुजर जाती है।
प्रकृति भी हो जाती है कुपित,
और फिर कयामत आती है।।
ये अंतस की पीड़ा होती है जो
जाने क्या क्या बहा ले जाती है।।
आंखें तो जो देखें हैं,उतना ही समझ पाती हैं।
मन की पीड़ा, कसक,मलाल,छटपटाहट किसी किसी को समझ आती है।।
प्रकृति हमे हर रूप में कुछ न कुछ अवश्य सिखाती है।
किसी को जल्दी,किसी को देर से,
पर समझ ज़रूर आती है।।
जैसी होती है मनस्थिति वैसी ही ये प्रकृति हमे नजर आती है।
मन खुश हो तो यही बरखा खुशी की फुलझड़ी नजर आती है।।
कभी देखना किसी खिड़की से धूप संग,एक तिरछी सी रेखा में,धूलि कण नृत्य करते से नजर आएंगे।
ये विविध विचार होते हैं लोगों के,
किसी को कोई,किसी को कोई भाएंगे।।
कभी देखना ज़रा गौर से,बारिश के बाद बादलों में विभिन्न आकृतियां नजर आएंगी।
कभी ईश्वर की,कभी पशुओं की छवि सुपुर्द ए नयन हो जाएंगी।।
अच्छी नहीं बहुत अच्छी लगती है मुझे ये बारिश,तन ही नहीं,अंतर्मन भी जैसे भीगा भीगा सा जाता है।
नहीं भागती मैं बचने के लिए बारिश से,मुझे तो आनंद सा आ
जाता है।
बचपन की चौखट पर दे जाती है दस्तक,वर्तमान अतीत से बतियाता है।
वो कागज की किश्ती,वो छप छप पानी में उछल कूद,सब बहुत ही याद फिर आता है।।
माटी पर गिरती है जब पहली पहली सी बारिश,माटी की सौंधी सौंधी महक से पूरा ही वजूद महक
सा जाता है।।
जल है तो कल है,जल है तो जीवन है,यह सत्य क्यों सब को समझ नहीं आता है???
सत्य सत्य ही होते हैं,बेशक वे कड़वे होते हैं।
यूं हीं तो नहीं ये सावन भादों इतने गीले गीले से होते हैं।।
स्नेह प्रेमचंद
Baarish ki gati aur veig ka man ki vibhinn avasthaon se tulna … ati sundar panktiyaan 👍
ReplyDelete