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Showing posts from May, 2026

मैने बोला मुख से राम

यूं हीं नहीं लिखी जाती किताब(( श्रद्धांजलि स्नेह प्रेमचंद द्वारा)

कोई जुगुनू नहीं,कोई दीपक नहीं निश्चित ही वह रही होगी *आफताब* यूं हीं तो नहीं लिखी जाती किताब कुछ नहीं,बहुत कुछ खास था उसमें कभी झूठ का नहीं ओढ़ा *नकाब* कितना भी कठिन हो कोई प्रश्न हौले से दे दिया करती *जवाब* *रौनक ए अंजुमन* का सही होगा उसे देना *खिताब* *चितचोर* कहना भी होगा सही उसे,एक अलग ही था उसका *रुआब* कोई इसके जैसा होगा नहीं कभी कोई दूजा,  पूरा लगा कर देख लिया *हिसाब* *उड़ान गगन सी था धरा सा धीरज* नहीं देखा उसे कभी *बेताब* आज भी सोचती हूं  जब उसके बारे में आंखों में आ जाता है*सैलाब* फूलों में से देना हो कोई नाम तो कहूंगी उसको खिला *गुलाब* छोटे से जीवन में जी गई जीवन बड़ा सा,कभी पसंद नहीं थे उसे शराब,शबाब और कबाब भगति धारा बहती थी चित में बड़े वेग से,ऐसी रही उसके जीवन की *किताब* हमारे परिवार का तो एक हीरा थी *नायाब* एक शब्द में करना हो परिभाषित उसे  होगा वह *लाजवाब* जाने इतना प्रेम कहां से लाई  प्रेम सुता सबसे ही करती थी *बेहिसाब* शीतल इतनी जैसे *माहताब*( चांद) धन्य हो गई मेरी लेखनी जो चली तुझ पर ओ*आफताब* मेरा लिखना सार्थक हो आया हो गई जैसे लेखन में *कामयाब* *हानि ...

कभी नहीं बदली

इजहार

गफलत

उम्र मिलती है

सागर नहीं

सद्गुरु हमारे तारणहार

भगति राह

अति दुर्लभ यह मानव जन्म

नहीं पता क्या नहीं पता

सुख दुख

दरकार

कह गए संत कबीर

खिताब

बेनजीर

जय श्री राम

लेखन किसी हाट में या बाजार में नहीं मिलता

ज़रूरी तो नहीं

चित हर्षित

धर धीर

कुछ नाते

कड़वा है मगर सत्य है

राम बाण

घर आंगन दहलीज है बेटी

एडजस्ट करो एडजस्ट करो

कड़वा है मगर सत्य है

कभी करो ना किसी की निंदा

होता नहीं आसान

कभी कभी

प्रेम हो जब परिवार में

स्नेह की स्नेह भरी दुआएं

उपहार

मैं सही तूं गलत

जवाब

यही यथार्थ है जीवन का

अब मुझे लगने लगा है

अब मुझे लगने लगा है जिंदगी में बेटी से अजीज  कुछ भी तो नहीं, मन का हर कोना इस भाव से सजने लगा है अब मुझे लगने लगा है जिंदगी लंबी भले ही ना हो  पर बड़ी हो सफलता मिले चाहे ना मिले, कर्म तो करना ही है, मन मेरा सत्य यह कहने लगा है सही सोच से जैसे कीचड़ में कमल कोई खिलने लगा है अब मुझे लगने लगा है सुनने में भले ही अच्छा लगे बेटा हुआ है जीने में बेटी से प्यारा कोई एहसास नहीं, देख लो चाहे सारी दुनिया,बेटी से अधिक कोई दिल के पास नहीं अब मुझे लगने लगा है जिंदगी के एक मोड़ पर तो बेटी मां की भी माँ बन जाती है मित्र,सलाहकार,सारे ही किरदार बखूबी निभाती है अब मुझे लगने लगा है वह शिक्षा मात्र अक्षर ज्ञान है जिसके माथ पर सोहते संस्कार नहीं वह परिवार भी क्या परिवार है होता जिसमें प्यार नहीं??? अब मुझे लगने लगा है हर सपने को पूरा करने की पुरजोर कोशिश करनी चाहिए प्रयास ही तो हमें खास बनाते हैं अब मुझे लगने लगा है हर सफर मंजिल की ओर जाए ज़रूरी तो नहीं, पर मंजिल की ओर जाता कोई न कोई सफर ही है, इसलिए सफर करना तो जरूरी है अब मुझे लगने लगा है दोस्त अधिक हों ज़रूरी तो नहीं पर ज...

फिर मैं संगीतज्ञ होती जीजी

ललाट

ज्योति प्रेम की

ज़रूरी तो नहीं

उठो द्रौपदी