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मां पर अभाव का प्रभाव ना था(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

मां पर किसी अभाव का प्रभाव नहीं था जो बहुत बड़ी बात है जो था जैसा था उसमें अपना बेस्ट करना उनकी फितरत में था घर आए लोगों को देख कभी उनकी पेशानी पर परेशानी की सिलवटें नहीं देखी

सच में मां का याद करो तो एक बात जेहन में आती है
*वो इतना सब कुछ कैसे कर लेती थी*

ईंटों के फर्श को रगड़ रगड़ लाल निकालना, सारा समान बाहर निकाल अच्छे से सफाई करना और तो और भैंसों की भी रंगीन कटिंग्स ला कर गल पट्टी बनाना 
कभी अपने परिवेश और परस्थिति को ना कोसना बस इसी लगन में रहना बच्चों को शिक्षित करना, कर्म का अनहद नाद  बजाना,हर संभावित सम्भावना को खंगालना,सुधार लाना और निखार  लाना
 
ग्रेट मां हम सारे मिल कर भी उतना नहीं कर सकते जो मां ने बिन किसी खास सुविधा और संसाधनों में कर दिखाया मां में जिजीविषा उल्लास था पर्वों के प्रति श्रद्धा थी सेलिब्रेट करना आता था मां को,मां में सबको अपना बनाने की कला थी वहीं चीज आगे जा कर अंजु में स्थानांतरित हो गई मां से बड़ी संस्कारों की पाठशाला कोई हो नहीं सकती जैसे जैसे ये दिवाली के आस पास के दिन आते हैं वो याद आ जाती है

याद आ जाता है मां का हर फंक्शन के पहले से ही तैयारी करना
और हिसाब से हर चीज पहले से ही खरीद लाना

याद आता है मा का कितने अच्छे स्वेटर बनाना वे भी सब के लिए
इतने नए डिजाइन कैसे  फंदा फंदा मां इतनी बुनाई कर लेती थी स्नेह की सलाइयों  पर कर्म की ऊन से
सुंदर से डिजाइन बना देती थी

याद आता है मां का सांझ ढले नहा कर अच्छा सूट पहन बाहर कुर्सियां बिछा कर बैठ जाना,औरतों का आना,मजे से गप्पे मारना

याद आता है मा का पार्क में होली पूजन पर लकड़ियां इकट्ठा करना

याद आता है मा का पूरी श्रद्धा से  श्राद्ध करना

याद आता है मा का बारिश में भी खाट लगा चूल्हे पर रोटी बनाना

याद आती है मा के हाथ की तंदूर की रोटी बैंगन का भरता लस्सी माखन बहुत कुछ याद आता है 
अपने घर के संग पड़ोसियों की भी भरी गर्मी में तंदूर पर रोटी लगाना

याद आता है मां का हर तीज पर सवाली पापड़ गुलगुले बनाना वह भी टोकरा भर भर

याद आता है मां का हर बच्चे के जन्म पर गूंद डालना,मां के वात्सल्य के कल कल बहते झरने का अनहद नाद याद आता है

याद आता है मां का भैंसों का काम करना, सिर पर जबर भ रोटा लाना,
इतने बर्तन धोना,कपड़े धोना,स्वाद  खाना बनाना

याद आता है मां का संकल्प को सिद्धि से मिलाना

याद आता है मां का भाई के पटियाला जाने पर सिर पर कपड़ा बांध निढाल हो कर  सो जाना

याद आता है मा का गेहूं की बोरियां तोलना और कभी कभी बारिश आने पर उन्हें भीतर डालना

याद आता है मा का हर नाते में ताल मेल बिठाने का हुनर

याद आता है मा का सब्र और मां का कर्म करने का अनोखा अंदाज

याद आता है मां का सहेली सा व्यवहार याद आता है मां का मुझे कहना सो जा कहां दिल्ली जायेगी बहुत ठंड है

याद आता है मां का घर आने पर दिल से स्वागत करना,हाथ पकड़ हौले से भीतर ले जाना,दिल की कहना,दिल की सुनना,अलमारी खोल सूट दिखाना

याद आता है मां का हर चुनौती को अवसर बनाना

याद आता है मा का वो 42 दिन मेरे साथ चिड़ावा में रहना,पूरे घर में अपनी छाप छोड़ना,मुझे ममता का सही मायने में मतलब समझाना

याद आता है मुझे मिठू होने से पहले मां संग 5 महीने बिताना और मां की उन दिनों में की गई परवाह,स्नेह और जज्बा

याद आता है मां का बच्चों में बच्चों सा, बड़ों में बड़ा सा वन जाना

मेरी मां को रिश्ते बहुत अच्छे से रफू करने आते थे

हर नाते की उधड़न की मां करती रहती थी तुरपाई
मां जैसा ना तो कोई था ना कोई होगा,मुझे तो बात इतनी समझ में आई

मां के प्रति दिल के सच्चे उद्गार प्रकट करना हमारी मां के लिए सच्ची श्रद्धांजलि है
We love, respect,admire & acknowledge her great will power We r lucky to have mother like our mother 

मांग लूं में मन्नत फिर वही धरा मिले मुझे और वहीं आसमा मिले
मांग लूं मैं  मन्नत फिर मुझे वही मेरी मां मिले

मां ने कब क्या कैसे कितना किया
सच में ये तो है एक बहुत ही लंबी कहानी
बेहतर नहीं बेहतरीन किया मां ने अपनी जिंदगी में,
मां कर्म की थी सच में दीवानी

कर्मों से भाग्य को बदलने का जज्बा मां में आता था नजर
अपने तो क्या मां की पराए भी करते थे कदर

काल के कपाल पर कुछ घटनाएं सदा के लिए चिन्हित हो जाती हैं
मेरी मां की कहानी है उनमें से ही
मां हर मोड पर आज भी याद आती है।।।।।

मां को अपनी लेखनी की हर रचना
मैं तहे दिल से समर्पित करती हूं 
भावों को शब्दों का कैसे पहना पाती मैं परिधान
गर मां ने दिलवाया ही ना होता मुझे अक्षर ज्ञान
शिक्षा की अलख जलाई मां ने चित में ऐसी,हर भाव को शब्दों का पहना ना चाहती हूं परिधान
मां के जीवन में होने से बच्चे बन जाते हैं धनवान

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