नैराश्य का तमस हटा,
आशा की आरुषि का प्रादुर्भव करना तुझे बखूबी आता था
भाग्य नहीं सौभाग्य था ये मेरा
जो तुझसे मां जाई का नाता था
आज बरस 4 हो गए तुझे हमसे
बिछड़े हुए,
तेरा जिक्र जेहन पर मीठी सी दस्तक दे जाता था
हर हालत में,हर हालातों में
चुनौती को अवसर बनाना आता था
मर्यादा,प्रतिबद्धता,दया,अनुराग
इन चारों का साथ तुझे तन मन से सुंदर बनाता था
जिंदगी पग पग पर लेती रही परीक्षा पर तुझे जिंदगी का हर प्रश्न पत्र हल करना आता था
कोई राग न था कोई द्वेष न था
बस चित में तुझे प्रेम बसाना आता था
कनेक्टिविटी,करुणा,कर्मठता रहे तेरे विशेष गुण,तुझे सबका साथ सुहाता था
यही थी तेरी सबसे बड़ी खासियत कि सबको लगता था तूं उसकी खास है तेरे स्नेह सानिध्य में तो कांटा भी सुमन बन जाता था
नीलम सी चमकती तूं पल पल
निर्मल चित और चारु चितवन से तेरा अस्तित्व हनी सा मीठा बन जाता था
यथार्थ से अवगत थी तूं भली भांति
तुझे वर्तमान में जीना आता था
सु मन में खिले रहते थे सुमन सदा
तेरा किरदार स्वयं सुवासित हो जाता था
धन्य हुई कोख मां सावित्री की,
ये मां बेटी का कितना प्यारा नाता था
इंदु सी शीतलता बच्चों सा जोश
आभामंडल परी सा,करने लगी बखान तो हर शब्द छोटा पड जाता था
भाग्य नहीं सौभाग्य रहा ये मेरा
जो तुझ से मां जाई का नाता था
क्रम में सबसे छोटी पर कर्मों में सबसे बड़ी,कंठ तेरा मधुर मधुर से नगमे गाता था
मुलाकात भले ही रोज न होती थी तुझ से,पर जब भी होती थी एक खास बात होती थी उसमें, सच में अंतर्मन तृप्त हो जाता था
संवाद,संबंध,संबोधन सब बेहतर नहीं बेहतरीन रहे तेरे,
शब्दों और भावों में अनूठा ताल मेल बिठाना आता था
हर नाते के ताने बानो को बुन देती थी स्नेह सूत्र से,
तुझे दिल में रहना बखूबी आता था
बेगाने भी हो जाते थे अपने
दिल प्रेम का नगमा गाता था
प्रेम सुता! तूने निभाया प्रेम सही मायनों में,
तेरे होने से ज़र्रा ज़र्रा प्रेममय हो जाता था
चित में करुणा,प्रेम और कर्म की त्रिवेणी को सतत बहाना तुझे बखूबी आता था
हर नाते को सींचा मधुर संवाद और संबोधन से,
हर संवेदना को बड़ी विनम्रता से छूना तुझे आता था
तर्क की चाशनी में डुबो कर सम्यक ज्ञान की बातों को मधुर बनाना आता था
बच्चों में बच्चों सी,बड़ों में बड़ी सी ये हुनर जन्मजात तुझे आता था
शून्य से शिखर तक के सफर में तुझे कीचड़ में कमल सा खिलना आता था
नैराश्य का तमस हटा,
आशा की आरुषि का प्रादुर्भव करना तुझे बखूबी आता था
सबसे जुड़ जाती थी दिल से,
तुझे दिल में उतरना आता था
संगीत बसता था तेरी नस नस में,*एक प्यार का नगमा* गीत तुझे घना भाता था
प्रेमसुता! तूं पर्याय रही प्रेम का,हर हालत और हालातों में तुझे प्रेम निभाना आता था
मात तात की रही तू लाडली
तेरा वजूद तो बेगानों को भी अपना बनाता था
मित्रों के चित पर करती थी राज तूं, हास परिहास संग गंभीर वार्तालाप किसी भी विषय पर तुझे बखूबी करना आता था
रौनक ए अंजुमन कहूं तो अतिश्योक्ति ना होगी,
हर महफिल में तुझे दिनकर सा दमकता आता था
धरा सा धीरज उड़ान गगन सी
संयम,स्नेह,शांति से तो जैसे तेरा जन्मों जन्मों का नाता था
*उम्र छोटी पर कर्म बड़े*
तेरा यह परिचय तुझे भीड़ से अलग बनाता था
कर्म ही गीता कर्म ही रामायण
यह संस्कार मिला तुझे मां से मा जाई,सत्कर्मों का निष्पादन करना तुझे बखूबी आता था
पहले तोलो फिर बोलो
यह जाना भी माना भी,
इंकार करना भी तुझे बड़े सलीके से आता है
कोई दिल में रहता है कोई दिमाग में,कोई चेतन में,कोई अचेतन में,पर तुझे तो सर्वत्र ही रहना आता था
अंतर्मन के गलियारों में कर विचरण आत्म निरीक्षण,आत्म मंथन कर फिर आत्म सुधार और निखार करना तुझे बखूबी आता था
अपने भीतर छिपी अथाह अनंत संभावनाओं को खंगालना फिर उनका दोहन कर the best करना तुझे स्वाभाविक रूप से आता था
सबके भीतर छिपा एक हनुमान है अक्सर कहा करती तूं,बस देखना किसी किसी को आता है
सबसे आसान काम है पढ़ाई करना,फिर कर्मों से भाग्य बदल जाता है
आज भी याद आती हैं तेरी ये सब बातें,तुझे कितनी अच्छे से बातें करना आता था
नैराश्य का तमस हटा आशा की आरुषि का प्रादुर्भाव करना तुझे बखूबी आता था
सत्य कह दिया तेरे बारे में वहीं बन गया लेखन,
वरना सच में मुझे कहां लिखना आता था
शुक्रगुजार हूं मैं मेरे गुरुजनों और मात पिता का जो दी शिक्षा उन्होंने,
वरना कैसे बता पाती तेरे बारे में जग को,तेरा वजूद तो घने तमस में जुगुनू सा चमक जाता था
आवागमन तो है दस्तूर ए जहान
आने वाले को पड़ता है जाना, तेरे जाने से पहले भला कब समझ आता था
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