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फिर से दहल गया है दिल्ली

फिर से दहल गया है दिल्ली क्यों पुख्ता नहीं होते इंतजाम?? तन आहत,रूह रेजा रेजा चमन बन गया रेगिस्तान शर्मसार हुई मानवता इंसान बन गया हैवान रौंदा,कुचला,मसला फिर किसी की अस्मत को,हैरानी भी होती हैरान सख्त सजा नहीं मिलती जब तक पुनरावृत्ति का होता काम जीवन पथ बना गया कोई अग्निपथ अति निंदनीय इस कुकर्म पर अब तो लग जाए विराम धरा का धीरज टूट गया अब रो रहा हो जैसे आसमान हर गली नुक्कड़ पर खड़े हैं रावण जाने कहां चले गए हैं राम??? अब माधव भी नहीं आते सुन पुकार किसी की, कलयुग में काली घटनाओं का घमासान कैसे कोई दोषित घूम सकता है सरे आम बहुत सो लिए,अब तो जाग ले ये आवाम चार दिनों की इस जिंदगी में हम धरा पर हैं मेहमान खुशी नहीं दे सकते किसी को,  कोई बात नहीं, पर कभी करें ना किसी को परेशान नहीं दिया हक विधाता ने हम को कि करें किसी को हम परेशान नारी तो रचती है सृष्टि,नारी से ही है यह जहां क्यों सो जाता है जमीर इंसा का, क्यों डोल जाता है उसका ईमान अपने भीतर के पशु को कर जागृत बन जाता है वह हैवान