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न भाव सक्षम न शब्द समर्थ (( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

न भाव सक्षम है ना शब्द समर्थ है
 जो तेरे व्यक्तित्व का कर पाएं बखान

*विनम्रता,करुणा,स्नेह,अपनत्व,
मधुर बोल,व्यवहार और ज्ञान*
यही पता था तेरे घर का,यही रही तेरी पहचान।। 

प्रेम सुता! तूं बड़े प्रेम से 
पाठ प्रेम का जग को पढ़ा गई,
कथनी में नहीं करनी में रहा विश्वाश तेरा,
तूं जाने क्या क्या सिखा गई???
केंद्रबिंदु रही तूं हर अंजुमन का ओ मां जाई! खोज लेती थी तूं हर समस्या का समाधान।
न भाव सक्षम हैं, न अल्फाज समर्थ हैं,
जो तेरे व्यक्तित्व का कर पाए बखान।।



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