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जाने कहां चले गए हैं माधव

जाने कहां चले गए हैं माधव???? नहीं सुनते अब किसी द्रोपदी की करुण पुकार आखिर कब तक चलता रहेगा ऐसे, न्याय के होंगे कब दीदार??? सुनो द्रौपदी बहुत हुआ अब, अंधा गूंगा बहरा शासन प्रशासन अन्याय मत करो स्वीकार कोमल हो कमजोर नहीं विहंगम सोच को दो आकार गोविंद नहीं आयेंगे द्रौपदी बनो खुद ही शक्ति खुद की होने ना दो दामन दागदार सुरक्षा तो हर बाला का है जन्मजात अधिकार कब तक करेंगे हम इसका इंतजार नाव को डुबो रही देखो  नाव की ही पतवार धिक धिक धिक धिक  धिक धिक्कार  होता है जब असमत का चोला तार तार पूरी मानवता का होता तिरस्कार इतने आंसू बन जाए पारावार अजाब सा बन  जाता है जीवन लगने लगता सब बेकार आया समय अब लगे ऐसी फटकार फिर कोई सोच भी ना पाए हो ना कभी किसी का बलात्कार जब तक सोच में नहीं होगा सुधार पुनरावृत्ति होती रहेगी बार बार

मां जैसा कोई रंगरेज नहीं

हानि धरा की

हानि धरा की,लाभ गगन का

हो नहीं सकता

हरियाणा वाले

फिर से दहल गया है दिल्ली

फिर से दहल गया है दिल्ली क्यों पुख्ता नहीं होते इंतजाम?? तन आहत,रूह रेजा रेजा चमन बन गया रेगिस्तान शर्मसार,कलंकित हुई मानवता इंसान बन गया हैवान रौंदा,कुचला,मसला फिर किसी की अस्मत को,हैरानी भी होती हैरान सख्त सजा नहीं मिलती जब तक पुनरावृत्ति का होता काम जीवन पथ बना गया कोई अग्निपथ अति निंदनीय इस कुकर्म पर अब तो लग जाए विराम धरा का धीरज टूट गया अब रो रहा हो जैसे आसमान हर गली नुक्कड़ पर खड़े हैं रावण जाने कहां चले गए हैं राम??? जाने कहां चले गए हैं राम अब माधव भी नहीं आते सुन पुकार किसी की, कलयुग में काली घटनाओं का घमासान कैसे कोई दोषी घूम सकता है  सरे आम बहुत सो लिए,अब तो जाग ले ये आवाम चार दिनों की इस जिंदगी में हम धरा पर हैं मेहमान खुशी नहीं दे सकते किसी को,  कोई बात नहीं, पर कभी करें ना किसी को परेशान नहीं दिया हक विधाता ने हम को लाएं किसी के जीवन में कोई व्यवधान नारी तो रचती है सृष्टि,नारी से ही है यह जहान क्यों सो जाता है जमीर इंसा का, क्यों डोल जाता है उसका ईमान अपने भीतर के पशु को कर जागृत बन जाता है वह हैवान