नहीं सुनते अब किसी द्रोपदी की करुण पुकार
आखिर कब तक चलता रहेगा ऐसे,
न्याय के होंगे कब दीदार???
सुरक्षा तो हर बाला का है जन्मजात अधिकार
कब तक करेंगे हम इसका इंतजार
नाव को डुबो रही देखो
नाव की ही पतवार
धिक धिक धिक धिक
धिक धिक्कार
होता है जब असमत का चोला तार तार
पूरी मानवता का होता तिरस्कार
इतने आंसू बन जाए पारावार
अजाब सा बन जाता है जीवन
लगने लगता सब बेकार
आया समय अब लगे ऐसी फटकार
फिर कोई सोच भी ना पाए
हो ना कभी किसी का बलात्कार
जब तक सोच में नहीं होगा सुधार
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