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चलो न मन ((विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

चलो मन वृन्दावन की ओर,
प्रेम का रस जहाँ छलके है।
माँ की ममता जहाँ महके है।
चिड़ियों से आंगन चहके है।
सदभाव जहाँ डाले है डेरा,
न कुछ तेरा,न कुछ मेरा,
आती समझ जिसको जहाँ ये
ऐसे घाट की ओर।

जहाँ जात पात का भेद नही है,
मज़हब की जहाँ हो न लड़ाई।
ऐसी वसुंधरा क्यों न बनाई???
हो जाये मनवा विभोर।

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