तेरी ज़िन्दगी की किताब के हर पन्ने से रूबरू हूँ मैं, ये बात दूसरी है हाल ए दिन बयान नही करती। चोट तुझे लगती है वहाँ, दर्द मुझे होता है यहाँ, बस ज़ब्त करने आ गए हैं ज़ज़्बात, पचा लेती हूँ, उनका इज़हार नहीं करती।। न गिला,न शिकवा,न शिकायत कोई तुझसे, तूँ बात भी करे या न करे, मैं इसरार नहीं करती। इन सबसे बहुत ही ऊपर है प्रेम का आशियाना, इसकी समीक्षा का मैं इख़्तियार नहीं करती।। बेशक तूँ ज़िक्र करे या न करे, मैं भी ज़िक्र ये बार बार नहीं करती। तुझे यूँ ही रहना है दिल मे सदा , मैं किसी और बात पर एतमाद नहीं करती।। चोट तुझे लगती है वहाँ, दर्द मुझे होता है यहाँ, बस इज़हार नहीं करती।। दिल मे हो कोई तो निकाल देती शायद, पर जो रूह में हो, उसे निकालना स्वीकार नही करती।। मिले खुशी तुझे जहाँ की सारी, सिवा इसके मैं दुआ कोई कभी नहीं करती।। मेरे मन के दर्पण में अक्स होता है तेरा प्रतिबिम्बित, दूसरे किसी अक्स में मैं विश्वास नहीं करती।। मेरी लेखनी के तरकश में हैं बाण बस तेरी ही यादों के, ये बात दूसरी है मैं इज़हार नहीं करती।। चोट तुझे लगती है वहाँ, दर्द मुझे होता है यहाँ, ये बात दूसरी है हाल ...