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डोर poem by sneh premchand

बड़ी ही कमज़ोर होती है रिश्तों की डोर, कटु वाणी के हथौड़े से टूट जाती है पल भर में ही,जाने कितने ही अहसासों को खामोशी का कफ़न उड़ाती है।।