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परिचय मेरी मां का

उजास

कैसे वृद्धाश्रम भर रहे हैं

भाग्य की बात

पिता कभी थकता नहीं(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा)

आपका नाम भी लिया काम भी लिया,आपसे सीखा सहजता और कर्मठता का सार तन्खाह तो तन ही खा जाता है अच्छा जीवन यापन करने के लिए कुछ और भी पड़ता है करना, कहते थे हर बार एक युग का अंत हो जाता है सच पिता के जाने के बाद सहजता दामन चुराने लगती है चित से जब भी पापा आते हैं याद जीवन जीया अपनी ही शर्तों पर पर कर्म करने से कभी मानी नहीं हार

जन्मदिन की बहुत बधाई(( दुआ बहन स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

लम्हा लम्हा बीत गए  जीवन के 65 साल समय समय पर जाने कितने ही बदले होंगे हालात और हाल समय अपनी गति से चलता रहा अपनी ही चाल  तू भी चलता रहा तू बढ़ता रहा गौरव हमारा बनता रहा,  हल करता रहा हर एक सवाल तू खुश रहे स्वस्थ रहे,हमारा भाई बड़ा कमाल क्लासिकल संगीत के प्रति अगाध प्रेम तेरा सच में बेमिसाल पाक कला में भी कर ली हासिल प्रवीणता,नातों को लेता है संभाल लहजे भले ही थोड़े तल्ख़ हैं तेरे, पर निर्मल चित है तेरा ओ मेरी मां के लाल जो सोचता है वही बोलता है दिल दिमाग दोनों में सामंजस्य रखता है हर हाल समय संग समझने लगा है प्रेम से बढ़ कर कुछ भी तो नहीं,प्रेम पुत्र रखने लगा है सबका ख्याल हम भी समझते हैं तुझ को भाई अपने जीवन की ढाल

संगीत