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साधारण परिवेश परवरिश असाधारण व्यक्तित्व मां का

जब पट खोले अलमारी के

मैं गंगा नगर हूं

रूह रेजा रेजा(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

रूह रेजा रेजा दिल तार तार अमानवीय घटना,मानवता शर्मसार कब तक चीर हरण होता रहेगा द्रौपदी का, कब तक आंचल होता रहेगा दागदार??? सबके घरों में हैं बहन बेटियां फिर ऐसी कुंठित सोच क्यों??  क्यों चित में इतने भयावह विकार कब आएगा रामराज्य कब होगी हर बाला सुरक्षित कब सही सोच को मिलेगा आकार??? चांद पर पहुंच गया है भारत पर अपनी बहन बेटियों को नहीं रख पाता सुरक्षित हर बार कभी कहीं कभी कहीं  नारी अस्मिता हो जाती है तार तार *भोग्या नहीं भाग्य है नारी* आखिर कब समझेगा यह संसार तभी लगती हैं आग कहीं कहीं सुनामी आती है बहन बेटियों संग जब होता है ऐसा प्रकृति भी कुपित हो जाती है हरी भरी फुलवारी को यह कौन बना गया रेगिस्तान क्यों इतना कामी हो गया प्राणी कब समझेगा वह नादान सही मायने में शिक्षा का अर्थ  तभी समझ में आएगा *सबकी बेटी हमारी बेटी*  यह भाव  जब चित में घर कर जाएगा

कहीं नहीं जाती मां

मां कहीं गई नहीं

नमन,वंदन,अभिनन्दन,चन्दन से डॉक्टर्स को