Skip to main content

गुरुपूर्णिमा विशेष(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*किसी भी बात को जो निरस्त नहीं दुरुस्त करे, वही गुरु है*

*हमारी खूबियां को पहचाने और हमारी खामियों को दूर करने की कोशिश करे, वही गुरु है*

*हमारे भीतर छिपे हनुमान को जो बाहर निकाल कर ले आए यानि हमारी सुप्त शक्तियों को जो जगाने का सामर्थ्य रखता हो,वही गुरु है*

*विकारों का शमन करवाए और सद्गुणों का विकास करवाए,वही गुरु है*

*अपने ज्ञान,विवेक और मार्ग दर्शन से जो हमारा चहुमुखी विकास करे, वही गुरु है*

*अपने ज्ञान का जो सतत अभिवर्धन करे,हर संभावित संभावना को अच्छे से खंगाले,
वही गुरु है*

*हमारी क्षमताओं का पूर्ण दोहन कर जो हमें धरा से अम्बर की ओर ले जाए,वही गुरु है*

*हमारी सफलता पर जो हमसे भी अधिक प्रसन्न हो जाए,हमारी उपलब्धि उसे अपनी उपलब्धि लगे और हमारी असफलता में भी जो हमारे साथ खड़ा हो, वही गुरु है*

*जीवन के कुरुक्षेत्र में जो बन सारथी कृष्ण सा हर अर्जुन को कर्म की गीता का संदेश देकर पथ प्रदर्शन करे,वही गुरु है*

*कर्म को आनंद बता कर जो परमानंद की अनुभूति करवाए,कठिन राहों को आसान बनाए,हमारे पैशन को प्रोफेशन बनवाने में जो हमारी मदद करे,
वही गुरु है*

*हमारी रुचियों का संवर्धन और मूल्यों का जो अभिवर्धन कर दे,उच्चारण नहीं जो आचरण में लाए,फर्श से अर्श तक का सफर सहजता से करवाए, वही गुरु है*

*असहज से जीवन को जो सहज बना दे,मन में सकारात्मकता के पुष्प खिला दे,चिंता नहीं जो चिंतन करना सिखा दे,कर्म की गीता का महत्व कथनी नहीं करनी में बतलाए, वही गुरु है*

*पेशानी की परेशानी जो देख ले,आंखें और चेहरा पढ़ ले,बिन कहे ही मन की जान ले, वही गुरु है*

*सुखद वर्तमान और सुरक्षित भविष्य की बारहखड़ी जो समझा दे, वही गुरु है*

*संकल्प को जो सिद्धि से मिलवा दे,सोच कर्म परिणाम की त्रिवेणी बहा दे,लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता सिखा दे,वही गुरु है*

*Date और Data तो गूगल बाबा सब बता देता है,सच्चा गुरु वही है जो चित की बंजर भूमि को उपजाऊ बना दे,हमारे भीतर जिज्ञासा की पौध लगा दे,दृष्टि नहीं दृष्टिकोण हमारा ऐसा बदल दे जो हम जग को अपने ही नज़रिए से देखें और जानें,एक स्वतंत्र सोच का जो विकास करा दे,निर्णय लेने की क्षमता का पुष्प खिला दे,वही गुरु है*

*चेतन और अचेतन दोनों ही मनों में चेतना का स्पंदन करा दे,आहत मन को हो राहत दे,वही गुरु है*

*हमारी मनःस्थिति को ऐसा बना दे कि कोई भी परिस्थिति हावी न होने पाए किसी भी हाल और हालात में,वही गुरु है*

*स्वप्रेरित कर दे,कर्म करने की आदत डाल दे, अनुशासन,मेहनत,करुणा,स्नेह जैसे भाव जो मन के भीतर तार दे,वही गुरु है*

*गुरु हो गर सोने सा,
शिष्य कुन्दन सा बन जाता है*

*गुरु तो वह पारस है
 जो पत्थर को भी  सोना बनाता है*

*गुरु हो जब द्रोण सा 
शिष्य अर्जुन बन जाता है*

*गुरु हो जब वशिष्ठ सा,
शिष्य राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम बन जाता है*

*गुरु हो गर चाणक्य सा,
शिष्य चंद्रगुप्त मौर्य बन जाता है*

*गुरु हो गर माधव सा तो पार्थ को गीता ज्ञान समझ में आता है*

*गुरु हो जब राम कृष्ण परमहंस सा,शिष्य विवेकानन्द बन जाता है*

*गुरु तो वह जौहरी है जो तराश देता है शिष्य को हीरे सा,यह निर्भर करता है शिष्य पर,क्या उसे हीरा बनना आता है*

*सुरक्षा,संरक्षा,संवृद्धि का विशाल वृक्ष है गुरु,जिसकी छाया तले शिष्य पल्लवित पुष्पित हो जाता है*

* गुरु गरिमा है गुरु महिमा है
गुरु ही हमें शून्य से शिखर तक ले जाता है*

*जीवन के हर चक्रव्यूह से गुरु बाहर निकाल कर लाता है*

*मलिन मनों से धुंध कुहासे गुरु ज्ञान ही हटाता है*

*गुरु हो गर अरस्तु सा 
शिष्य विश्व विजेता सिकंदर बन जाता है*

*स्नेह,समर्पण,निष्ठा,आदर हो गर चित में गुरु के लिए तो शिष्य गुरु से भी आगे बढ़ जाता है*

*सपने वे होते हैं जो हमें सोने नहीं देते*
ऐसे सपने भी देखना गुरु ही हमें सिखाता है*

*हम जुगनू,दिनकर है गुरु,मेरी सोच को तो यही समझ में आता है*

*कर्ता करे ना कर सके
गुरु करे सो होय*
*तीन लोक नौ खंड में
गुरु से बड़ा ना कोय*

Comments

Popular posts from this blog

वही मित्र है((विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

कह सकें हम जिनसे बातें दिल की, वही मित्र है। जो हमारे गुण और अवगुण दोनों से ही परिचित होते हैं, वही मित्र हैं। जहां औपचारिकता की कोई जरूरत नहीं होती,वहां मित्र हैं।। जाति, धर्म, रंगभेद, प्रांत, शहर,देश,आयु,हर सरहद से जो पार खड़े हैं वही मित्र हैं।। *कुछ कर दरगुजर कुछ कर दरकिनार* यही होता है सच्ची मित्रता का आधार।। मान है मित्रता,और है मनुहार। स्नेह है मित्रता,और है सच्चा दुलार। नाता नहीं बेशक ये खून का, पर है मित्रता अपनेपन का सार।। छोटी छोटी बातों का मित्र कभी बुरा नहीं मानते। क्योंकि कैसा है मित्र उनका, ये बखूबी हैं जानते।। मित्रता जरूरी नहीं एक जैसे व्यक्तित्व के लोगों में ही हो, कान्हा और सुदामा की मित्रता इसका सटीक उदाहरण है। राम और सुग्रीव की मित्रता भी विचारणीय है।। हर भाव जिससे हम साझा कर सकें और मन यह ना सोचें कि यह बताने से मित्र क्या सोचेगा?? वही मित्र है।। बाज़ औकात, मित्र हमारे भविष्य के बारे में भी हम से बेहतर जान लेते हैं। सबसे पहली मित्र,सबसे प्यारी मित्र मां होती है,किसी भी सच्चे और गहरे नाते की पहली शर्त मित्र होना है।। मित्र मजाक ज़रूर करते हैं,परंतु कटाक...

बुआ भतीजी

सकल पदार्थ हैं जग माहि, करमहीन नर पावत माहि।।,(thought by Sneh premchand)

सकल पदारथ हैं जग मांहि,कर्महीन नर पावत नाहि।। स--ब कुछ है इस जग में,कर्मों के चश्मे से कर लो दीदार। क--ल कभी नही आता जीवन में, आज अभी से कर्म करना करो स्वीकार। ल--गता सबको अच्छा इस जग में करना आराम है। प--र क्या मिलता है कर्महीनता से,अकर्मण्यता एक झूठा विश्राम है। दा--ता देना हमको ऐसी शक्ति, र--म जाए कर्म नस नस मे हमारी,हों हमको हिम्मत के दीदार। थ-कें न कभी,रुके न कभी,हो दाता के शुक्रगुजार। हैं--बुलंद हौंसले,फिर क्या डरना किसी भी आंधी से, ज--नम नही होता ज़िन्दगी में बार बार। ग--रिमा बनी रहती है कर्मठ लोगों की, मा--नासिक बल कर देता है उद्धार। हि--माल्य सी ताकत होती है कर्मठ लोगों में, क--भी हार के नहीं होते हैं दीदार। र--ब भी देता है साथ सदा उन लोगों का, म--रुधर में शीतल जल की आ जाती है फुहार। ही--न भावना नही रहती कर्मठ लोगों में, न--हीं असफलता के उन्हें होते दीदार। न--र,नारी लगते हैं सुंदर श्रम की चादर ओढ़े, र--हमत खुदा की सदैव उनको मिलती है उनको उपहार। पा--लेता है मंज़िल कर्म का राही, व--श में हो जाता है उसके संसार। त--प,तप सोना बनता है ज्यूँ कुंदन, ना--द कर्म के से गुंजित होता है मधुर व...