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फिर एक बार(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा)

*आ जाते हैं दौड़े दौड़े हर बार*
*ऐसे ये रंगरेज अनोखे*
*करने सार्थक अपना इतवार*

*बदरंग दीवारों पर रंग खिला कर
हिसार को कर देते हैं गुलज़ार*

*आप भी आओ,हम भी आएं
किस बात का है इंतजार????

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