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बहस का अंत जीत नहीं थकान होती है

हर बहस का अंत जीत नहीं, 
सिर्फ थकान होती है
पहले हर बात पर जवाब देना ज़रूरी लगता था,
अपनी बात साबित करने की एक आग थी भीतर…
लेकिन अब वो आग ठंडी हो गई है,
और उसकी जगह एक सुकून ने ले ली है
अब चुप रह जाना आसान लगता है,
क्योंकि हर इंसान अपने ही सच में जी रहा है
और किसी का सच बदलने की कोशिश,
दरअसल खुद को ही थकाने जैसा है
धीरे-धीरे ये एहसास गहरा हो जाता है
हर लड़ाई लड़ना जरूरी नहीं होता
कुछ लोग समझने के लिए नहीं,
सिर्फ बोलने के लिए होते हैं
हर बार समझाने की कोशिश में
हम खुद ही उलझते चले जाते हैं…
इसलिए अब न बहस न सफाई 
बस थोड़ा दूर हो जाते हैं
क्योंकि कुछ रिश्ते जीतकर नहीं,
छोड़कर ही बचते हैं
और कुछ सुकून ऐसे होते हैं
जो जवाब देने में नहीं,
चुप रह जाने में मिलते हैं
अब हम साबित करने नहीं,
संभालने लगे हैं
खुद को, अपनी शांति को
शायद यही समझदारी है
कि हर आवाज़ का जवाब आवाज़ नहीं होता,
और हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता
कुछ बातें हवा में छोड़ देना ही बेहतर है…
ताकि हम खुद के भीतर
थोड़ा कम टूटें,
और थोड़ा ज्यादा बचें…
अपनों से जीत कर भी हम हार ही जाते हैं
मैं सही तूं गलत करते करते समय गंवाते हैं
क्षणिक से इस क्षणभंगुर जीवन में स्थाई सी रंजिशें बढ़ाते हैं
बीता वक्त नहीं आता लौट कर
समय रहते समझ नहीं पाते हैं
जब चिड़िया चुग जाती है खेत
पाछे पछताते हैं
क्या रखा है सिद्ध करने में,
नाते कोई गणित की थ्योरम नहीं
ये क्यों भूले जाते हैं????

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