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सावन आने पर क्यों बुआ का मन बेटी सा हो जाता है

सावन आने पर जाने क्यों बुआ का मन बेटी सा हो जाता है *दिल तो बच्चा है जी* यदा कदा अतीत के गलियारों में जाना उसे भाता है बुआ कभी तो बेटी थी उस आंगन की, भले ही समय संग दौर बदल जाता है आज भी बुआ को अपने भाई भतीजों में मात तात का अक्स नजर आता है स्नेह डोर से जुड़ और भी गहरा हो जाता उसका नाता है वह कुछ लेने नहीं आती पीहर उसका दिल तो अपनों को देख ही खुश हो जाता है सावन आने पर बुआ का दिल सच बेटी सा हो जाता है उस आंगन की माटी की सौंधी सौंधी महक से अंतर्मन उसका पूरे का पूरा  महक जाता है याद आती है उसे अपनी वह गुड़िया अपनी अलमारी अपनी सखी सहेलियाँ,अवरुद्ध सा कंठ रूंधा रुंधा हो जाता है खो जाती है बुआ अतीत के गलियारों में,उसे भतीजी में अपना अक्स नजर आता है याद आते हैं उसे वे मां बाबुल,कतरा आंसू का,कोना आंखों का गीला कर जाता है याद आता है बुआ को वह प्यारा सा बचपन,जहां अधिकार बड़े रौब से मुस्कुराते थे छोटी सी बात पर रूठ जाती थी बुआ, मात पिता उनके कितनी बार मनाते थे जब जब भी आता है सावन, बुआ का दिल बेटी सा हो जाता है आते हैं जब भात कोथली स्नेह परवाह से हाथ मिलाता है कोयल की पीहू पीहू   ए...

ढाल से मात पिता

वह गीता बन कर दिखा गई

मां की पुण्यतिथि पर शत शत नमन

उत्सव नहीं महोत्सव

मां ही कर्म मां ही कर्ता

माँ का होना उतना ही गहरा प्रभाव छोड़ता है, जितना माँ का न होना। जब तक माँ साथ थीं, तब तक उनके होने का अहसास जीवन में उतना ही प्रगाढ़ था, जितना आज उनके न होने का यह अथाह खालीपन है। जीवन का कोई भी सुख हो या कोई भी दुःख, एक शब्द जो अनायास ही मन में उभर आता है, वह है ..माँ”। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जब उस की याद मेरे साथ न हो। और मुझे विश्वास है कि मेरी अंतिम साँस तक वो मेरे भीतर, मेरी चेतना में, मेरे अस्तित्व में जीवित रहेंगी। आज मुझे लगता है कि मेरा पूरा वजूद मेरी माँ का ही दिया हुआ है। मैं जो भी हूँ, वह केवल और केवल उनके अथक परिश्रम, त्याग, संस्कार और प्रेम का परिणाम है। उसकी तपस्या का ही फल है कि हम सभी भाई-बहन आज एक सम्मानपूर्ण, सुरक्षित और संतुलित जीवन जी रहे हैं। माँ का साहस, उसकी दूरदृष्टि, उसकी  व्यावहारिक बुद्धिमत्ता, उसका  अटूट हौसला और काम करने की उसकी अद्भुत क्षमता वास्तव में बेमिसाल थी। जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी माँ ने कभी हार नहीं मानी। वे स्वयं एक संस्था थीं, एक प्रेरणा थीं। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना ऐसा लगता है, मानो सूर्य को दीपक दि...

सावन आने पर क्यों बुआ का दिल बेटी सा हो जाता है(स्नेह प्रेमचंद)