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ओ लेखनी। poem by sneh premchand

लेखनी! चलती है जब तूँ मात पिता पर,
तेरा रंग, रूप,सोच,समझ पल भर में ही बदल जाते हैं।
हमारे बेहतर मुस्तकविल के लिए वो हर सम्भव प्रयास को जीवन का हिस्सा बनाते हैं।।

इतनी सुंदर, सार गर्भित और प्रेममयी हो जाती हो तुम,
सुंदर अहसासात,सहित अल्फ़ाज़ों के दौड़े आते हैं।।
करते हैं वे तरबीयत हमारी,देते हैं हमें तवज्जो, तालीम और ऐशो आराम
बिन किसी खास त्वको के,हैं मात पिता ही चारों धाम।।
बिन किसी पूर्वाग्रह के मन से करें हम उनका एहतराम।।
ख़ौफ़खुदा हो रूह में हमारे,हम भी रखें उनका ध्यान।
एक दिन तो सुपुर्द ए खाक होना ही है,
सत्कर्मों से ही मिलते हैं सुपरिणाम।।
हम जाने कहाँ कहाँ मसरूफ रहने के करते रहते हैं बहाने,
वे समझते हैं बच्चे हमारे हो गए हैं सयाने।।
जेहन में हो हमारे अब तो अहसासज़िम्मेदारी,
हमारी फेरहिस्त में हो वे,
समझने की आ गयी है बारी।।
जन्नत है सिर पर हमारे है गर सिर पर उनका साया।
जहनुम है हर ऐशो आराम,माँ बाप को जिसने न पाया।।
उनकी मोहब्बत में तो समय के साथ साथ इज़ाफ़ा ही होता है। 
हम ही तंगदिल हो जाते हैं,एक दूरी और उपेक्षा
का चित्त में बहता स्त्रोता है।।
उनके जेहन में बहुत ऊपर होते हैं हमारे शौक, ख्वाब और ख़्वाईष्यात
हम पूरी भी नही करते उनकी बुनियादी ज़रूरियात।।
कुछ तो हैं फ़र्ज़ हमारे,बने हम उनके फरमा बरदार
उनका साया सिर पर होने से,हों ईश्वर के हम शुक्रगुजार।।
             स्नेहप्रेमचंद

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