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चलो मन(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*चलो मन*
चलते हैं वहां,
होती हो जहां
 उजली सी भोर।।

*चलो मन*
जहां रचनात्मकता का होता हो मधुर सा शोर।।

*चलो मन*
 जहां एक और एक होते हों ग्यारह,
है,जोश, जज्बे और जुनून का जो ठौर।।

*चलो मन*
 जहां कोई राग नहीं कोई द्वेष नहीं कोई कष्ट नहीं,कोई क्लेश नहीं,
कोई अवसाद नहीं,कोई विषाद नहीं,
जहां स्नेह सरगम का बजता हो *अनहद नाद* सा
इसके जैसा समूह नहीं कोई और।।

*हमारा प्यारा हिसार* समूह का नाम आता है मेरे जेहन में तो,
नाम ही नहीं काम भी इनका कर देता है भाव विभोर।।

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