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इस बार दिवाली में(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*झाड़ना ही है तो घर संग मन की भी गर्द झाड़ लो इस बार दिवाली में*

*रंगना ही है तो रंग लो मन प्रेम से,
 ऐसा कोई रंगरेज बुला लो इस बार दिवाली में*

*जलाना ही है तो जला लो  दीया ज्ञान का,
 ले आओ ऐसे ज्ञान दीये इस बार दिवाली में*

*शमन करना ही है तो करो विकारों का 
लोभ,मोह,काम,क्रोध,ईर्ष्या,अहंकार
सबका करो शमन,
 इस बार दिवाली में*

 *भला करना ही है तो करो कुम्हार का, 
खरीद माटी के दीये उससे जो लाए उजियारे उसकी अंधेरी झोपड़ी में भी,
 इस बार दिवाली में*

*जमी है बर्फ जो किसी रिश्ते पर मुद्दत से,पिंघला दो स्नेह सानिध्य से इस बार दिवाली में*

*जाले उतारने ही हैं तो तो उतार दो पूर्वाग्रहों, नफरतों, भेदभाव के इस बार दिवाली में*

 *धोनी ही है तो धो डालो समस्त बुराइयां चित से, हो जाए मन उजला,निर्मल, पावन इस बार दिवाली में*

 *विचरण करना ही है तो करो मन के गलियारों में,जहां गए नहीं बरसों से, करो मुलाकात खुद की खुद से इस बार दिवाली में* 

*देना ही है तो दो यथा संभव दान जरूरतमंदों को इस बार दिवाली में* 

*देना ही है वक्त तो दो अपने माता-पिता को इस बार दिवाली में*

*मिटानी ही है दूरियां तो मिटा दो बहुत ही खास अपनों से,
 बूढ़े माता-पिता के पहलू में बनकर छोटे बच्चे फिर समा जाओ इस बार दिवाली में* 

*मीठा खाना ही है तो भर लो मिठास अपने व्यवहार और अपनी वाणी में इस बार दिवाली में*

 हटाना ही है तो हटा दो मलिन मनों *से धुंध कुहासे, 
अनुराग से हो आलिंगनबद्ध एकाकार हो जाओ इस बार दिवाली में*

Comments

  1. बहुत ही सुन्दर कविता 🫶🫶 एक अत्यंत ही सुंदर तरीके से दिवाली के त्यौहार के हर पहलू को...भावो को साझा किया गया है😊

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