कोई जुगुनू नहीं,कोई दीपक नहीं
निश्चित ही वह रही होगी *आफताब*
यूं हीं तो नहीं लिखी जाती किताब
कुछ नहीं बहुत कुछ खास था उसमें
कभी झूठ का नहीं ओढ़ा नकाब
कितना भी कठिन हो कोई प्रश्न
हौले से दे दिया करती जवाब
कोई इसके जैसा होगा नहीं कभी कोई दूजा,
पूरा लगा कर देख लिया हिसाब
*उड़ान गगन सी था धरा सा धीरज*
नहीं देखा उसे कभी बेताब
आज भी सोचती हूं
जब उसके बारे में
आंखों में आ जाता है*सैलाब*
फूलों में से देना हो कोई नाम तो
कहूंगी उसको खिला *गुलाब*
हमारे परिवार का तो एक हीरा थी *नायाब*
एक शब्द में करना हो परिभाषित उसे होगा वह *लाजवाब*
जाने इतना प्रेम कहां से लाई
प्रेम सुता
सबसे ही करती थी *बेहिसाब*
शीतल इतनी जैसे *माहताब*( चांद)
धन्य हो गई मेरी लेखनी
जो चली तुझ पर ओ*आफताब*
मेरा लिखना सार्थक हो आया
हो गई जैसे लेखन में *कामयाब*
*हानि धरा की लाभ गगन का"
यही शीर्षक लगा सार्थक *नायाब*
*मेरी नजर से मेरी मां जाई*
स्नेह ने किया स्नेह तुझे *बेहिसाब*
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