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चित की बंजर भूमि को गुरु उपजाऊ बनाता है(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा)


*चित की बंजर भूमि को 
गुरु ही उपजाऊ बनाता है
गुरु हो गर सोने सा,
शिष्य कुन्दन बन जाता है*

*गुरु तो वह पारस है
 जो पत्थर को सोना बनाता है
गुरु ही है वह पथ प्रदर्शक
 जो फर्श से अर्श की ओर
 ले जाता है*

*गुरु हो जब *राम कृष्ण परमहंस* सा शिष्य *विवेकानन्द* बन जाता है
*उम्र छोटी पर कर्म बड़े*
ऐसा शिष्य अमेरिका में निज संबोधन से इतिहास रचाता है*

*दिल में स्नेह,दिमाग में ज्ञान,जेहन में करुणा सिंधु सदा गुरु के लहराता है,
अपने से भी आगे जाते देख शिष्य को गुरु का सीना चौड़ा हो जाता है*

*गुरु हो गर *माधव* सा तो
पार्थ को गीता ज्ञान समझ में आता है
मोह ग्रस्त सा अर्जुन कठिन मोड़ पर अपना धर्म समझ फिर पाता है
मानो चाहे या ना मानों,
कर्म इंसान को सुंदर बनाता है*

*चित की बंजर भूमि को 
गुरु उपजाऊ बनाता है
सुरक्षा,संरक्षा,संवृद्धि का विशाल वृक्ष है गुरु,
जिसकी छाया तले शिष्य पल्लवित पुष्पित हुए जाता है*

*गुरु गरिमा है गुरु महिमा है
गुरु ही हमें शून्य से शिखर तक ले जाता है
गुरु हो गर *द्रोण* सा शिष्य *अर्जुन* महान धनुर्धर बन जाता है
गुरु हो गर सोने सा 
शिष्य कुन्दन बन जाता है
चित की बंजर भूमि को गुरु ही उपजाऊ बनाता है*

*गुरु तो वह जौहरी है 
जो तराश देता है शिष्य को हीरे सा,
यह निर्भर करता है शिष्य पर
 क्या उसे हीरा बनना आता है*
 
*वर्तमान में अर्जित की विद्या भविष्य को उज्ज्वल बनाती है,
गुरु की यह सीख शिष्य के जीवन के हर मोड पर काम आती है*

*Date और Data तो मिल जाता है गूगल बाबा पर ही,
गुरु वही जो चित में जिज्ञासा का अंकुर प्रस्फुटित किए जाता है
स्वप्रेरित कर देता है गुरु ऐसे,
शिष्य कर्तव्य पथ पर बिन विचलित हुए चलते चला जाता है*

*गुरु देता है शिक्षा हर शिष्य को
पर कोई प्रथम कोई अंत में आता है
गुरु हो गर *चाणक्य*सा आम सा शिष्य *चंद्रगुप्त मौर्य* बन जाता है*

*गुरु ही है जो शिक्षा भाल पर
 तिलक संस्कारों का लगाता है
कथनी करनी एक समान हो हमारी,उच्चारण नहीं गुरु आचरण में विश्वाश रखना सिखाता है*

*गुरु ही ब्रह्मा गुरु ही विष्णु
गुरु जीवन धुरि कहलाता है
चित की बंजर भूमि को
गुरु उपजाऊ बनाता है*

*हर सफर मंजिल की ओर जाए 
ज़रूरी तो नहीं,पर मंजिल की ओर जाएगा कोई ना कोई सफर ही,गुरु कर्म की महत्ता सही मायने में शिष्य को समझाता है*

*गुरु हो जब *वशिष्ठ* सा शिष्य राम से *मर्यादा पुरुषोत्तम राम* बन जाता है
गुरु हो गर सोने सा,
शिष्य कुन्दन बन जाता है
चित की बंजर भूमि को
 गुरु उपजाऊ बनाता है

*सफलता का कोई शॉर्ट कट नहीं होता,सही दिशा में सही समय पर सार्थक कर्म करने से सफर सुहाना हो जाता है
ऐसी बातें गुरु डाल देता है जेहन में हमारे,जीवन अग्नि पथ ना हो कर सहज पथ बन जाता है*

*हर संशय को मिटा देता है गुरु चित से,फिर सब समझ में आता है
हर दुविधा बन जाती है सुविधा,
सफर जीवन का सरल बन जाता है*

*आहत चित को गुरु देता है राहत
प्रेरित मन सुपरिणामों का द्वार खटखटाता है
जीवन के हर चक्रव्यूह से गुरु ज्ञान बाहर निकाल कर लाता है*

*मलिन मनों से धुंध कुहासे
गुरु ज्ञान ही हटाता है
चित की बंजर भूमि को गुरु ही उपजाऊ बनाता है
गुरु हो गर सोने सा,
शिष्य कुन्दन बन जाता है*

*सबके भीतर छिपा है एक *हनुमान*
हमारी आंतरिक सुप्त शक्तियों से हमारा परिचय गुरु ही करवाता है*

 *असीमित संभावनाओं के अथाह सागर में जब चलती है मधानी प्रयासों की,
सुपरिणाम बाहर निकल कर आता है*

*चाहे तो क्या नहीं कर सकते हम
गुरु यही अहसास पग पग पर करवाता है
*कर्म बदल सकता है भाग्य*
इसी भाव की अखंड ज्योत गुरु जीवन के प्रांगण में जलाता है*

*जोश,जज़्बा और जुनून तीनों की घुट्टी गुरु पिलाता है
अनुशासन,मर्यादा,प्रतिबद्धता,मेहनत जाने कितने ही सद्गुण चित में रोपित किए जाता है*

*गुरु हो गर *ऋषि संदीपानी*जैसे
तो शिष्य *कान्हा से द्वारकाधीश* बन जाता है

*स्नेह,समर्पण,निष्ठा,आदर हो गर चित में गुरु के लिए,
शिष्य गुरु से भी आगे बढ़ जाता है*

*आलस्य,व्यसन दीमक हैं शिष्य के जीवन में,हर मोड पर गुरु समझाता है
*सपने वे होते हैं जो हमें सोने नहीं देते*
ऐसे सपने भी देखना *अब्दुल कलाम* सा गुरु ही हमें सिखाता है*

*हम जुगनू,दिनकर है गुरु,
मेरी सोच को इतना ही समझ में आता है
गुरु की महिमा है गोबिंद से भी ऊपर,
गुरु हमें जीने की राह सिखाता है*
"गुरु उम्र ओहदे में हम से बड़ा ही हो ज़रूरी तो नहीं,कई बार छोटों में भी अक्स गुरु का नजर आता है*
मां होती है हमारी प्रथम गुरु,
मां से बेहतर गुरु मुझे तो कोई नजर नहीं आता है
जो भी सिखाता है हमें जीवन के किसी भी मोड़ पर,वह गुरु कहलाता है**

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