Skip to main content

न कोई है,न कोई था,न कोई होगा

न कोई था,न कोई है,न कोई होगा
माँ से बढ़ कर कभी महान।
एक अक्षर के छोटे से शब्द में
सिमटा हुआ है पूरा जहान।।
धन चाहिए,न दौलत चाहिए,
चाहिए औलाद के दो मीठे से बोल।
मूर्ख प्राणी ही ममता को,
दूजे रिश्तों से लेते हैं तोल।।
फरिश्ता है माँ अनमोल,धरा पर,
माँ बिन जीवन है वीरान।
हर शब्द पड़ जाता है छोटा ,
जब माँ का करने लगो बखान।।
अपनी कार्यशैली से माँ,
संस्कारों की घुट्टी सहज पिला देती है।
देती ही देती है वो ज़िन्दगी भर,
औलाद से कुछ नही लेती है।।
बहुत शक्ति है उसकी दुआओं में
माँ होती है गुणों की खान।
पत्थर भी पिंघल जाएं जिसकी ममता से,
माँ का सम्भव नही बखान।।
न कोई था,न कोई है,न कोई होगा,
माँ से बढ़ कर कभी महान।।
प्रेमकावड़ में जल भर आकंठ तृप्ति का,
माँ सहज ही करा देती है अहसास।
घर नही स्वर्ग होता है वो आशियाना,
जहाँ पर माँ करती है वास।।
माँ है जहां,ममता है वहाँ,
माँ है जहाँ, पर्व उत्सव उल्लास है वहाँ,
माँ है जहाँ, जीवन है वहाँ।।
हर माँ सुंदर है जग में,
सामर्थ्य से अधिक कर देती है कुर्बान।
एक अक्षर के छोटे से शब्द में,
सिमटा हुआ है पूरा जहान।।
शनै शनै हमारे अस्तित्व को,
माँ अपने व्यक्तित्व से ऐसे रंगती
चली जाती है।
जैसे रंग देता हो रंगरेज चुनरिया
माँ तन को रूह से मिलाती है।।
कैसे भूल सकते हैं हम इस सत्य को,
माँ अपनी जान पर खेल हमे इस 
जग में लाती है।
यूँ ही तो नही ये पूरी सृष्टि,
गुण माँ के तहे दिल से गाती है।।
माँ का हिवड़े दुखने वालों को,
नरक में भी स्थान नही मिलता है।
गहरे सांसारिक कीचड़ में भी,
माँ ममता का कमल जीवनपर्यंत खिलता है।।
सुगंधित सा हो जाता है जीवन संग मां के,
मां बिन लगता सब सुनसान।
हर शब्द पड़ जाता है छोटा,
जब माँ का करने लगो बखान।।
एक पूर्णता एक सहजता एक जिजीविषा
सब माँ संग होते अनुपम उपहार।
एक बात आती है समझ मे,
प्रेम ही माँ की ममता का आधार।।
जीने की वजह मिल जाती है माँ के होने से,
बिन उसके सूना है संसार।।
कर माँ की अद्वितीय रचना,
ईश्वर भी हो गया होगा हैरान।।
न कोई था,न कोई है,न कोई होगा
माँ से बढ़ कर कभी महान।।
                स्नेह प्रेमचन्द


Comments

Popular posts from this blog

वही मित्र है((विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

कह सकें हम जिनसे बातें दिल की, वही मित्र है। जो हमारे गुण और अवगुण दोनों से ही परिचित होते हैं, वही मित्र हैं। जहां औपचारिकता की कोई जरूरत नहीं होती,वहां मित्र हैं।। जाति, धर्म, रंगभेद, प्रांत, शहर,देश,आयु,हर सरहद से जो पार खड़े हैं वही मित्र हैं।। *कुछ कर दरगुजर कुछ कर दरकिनार* यही होता है सच्ची मित्रता का आधार।। मान है मित्रता,और है मनुहार। स्नेह है मित्रता,और है सच्चा दुलार। नाता नहीं बेशक ये खून का, पर है मित्रता अपनेपन का सार।। छोटी छोटी बातों का मित्र कभी बुरा नहीं मानते। क्योंकि कैसा है मित्र उनका, ये बखूबी हैं जानते।। मित्रता जरूरी नहीं एक जैसे व्यक्तित्व के लोगों में ही हो, कान्हा और सुदामा की मित्रता इसका सटीक उदाहरण है। राम और सुग्रीव की मित्रता भी विचारणीय है।। हर भाव जिससे हम साझा कर सकें और मन यह ना सोचें कि यह बताने से मित्र क्या सोचेगा?? वही मित्र है।। बाज़ औकात, मित्र हमारे भविष्य के बारे में भी हम से बेहतर जान लेते हैं। सबसे पहली मित्र,सबसे प्यारी मित्र मां होती है,किसी भी सच्चे और गहरे नाते की पहली शर्त मित्र होना है।। मित्र मजाक ज़रूर करते हैं,परंतु कटाक...

बुआ भतीजी

महिला(( नारी शक्ति पर बेहतरीन कविता स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

मजबूत हौंसला,बुलंद इरादे, आज की महिला की यही पहचान दिल पर दस्तक,दिमाग में बसेरा चित में इसके पक्के निशान महिला ही तो देती है जन्म सृष्टि को सच में ईश्वर का धरा पर है वरदान अपनी जान पर खेल हमें जगत में लाने वाली के लिए बहुत छोटा है शब्द महान जीवन की डगर आसान नहीं किसी भी महिला की, संकल्प से सिद्धि तक के सफर में कितने ही आते हैं व्यवधान पर वो रुकती नहीं है,चलती रहती है बेशक जानती नहीं परिणाम  अपने ही पर्याय को उतार   धरा पर बेफिक्र सा हो गया भगवान खास नहीं अति खास मूढ में रहा होगा  विधाता,  जब नारी का किया होगा निर्माण आज कोई भी क्षेत्र नहीं अछूता नारी शक्ति से, हर क्षेत्र में नारी ने बना ली है पहचान दिल दिमाग में सामंजस्य बिठाना आता है नारी को, सदा ऋणी रहेगा नारी का ये जहान