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महफ़िल Thought by sneh premchand

हर महफ़िल हो जाती है सूनी, 
जहाँ ज़िक्र कभी उनका न हो।
हर राह हो जाती है गुमराह,
जहाँ से उनका जाना न हो।।
हर परछाई पड़ जाती है छोटी,
जब शीतल सा साया न उनका हो।।
हर ख्याल हो जाता है बदगुमान
जब तरुनम न ज़िन्दगी में उनकी हो।।
       स्नेह प्रेमचंद

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