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क्या लिखूं तेरे बारे में thought by sneh premchand

 बारे में क्या लिखूं मैं, माँ तूने तो मुझे ही लिख डाला,कहाँ से लाऊँ वो स्याही और लेखनी,जो  कह पाएं सर्वसत्य,कैसे किन किन जतनो से होगा तूने हम सबको पाला।।
तेरे बारे में कुछ लिख सकें, ये सामर्थ्य मेरी लेखनी में नही,बस एक अरदास है परमपिता परमेश्वर से,वो जहां भी है,उन्हें शांति मिले, उनके ऋण से उऋण तो हम कभी हो ही नही सकते,उनके कर्म,प्रयास,ऊंचे सपनो का बखान भी सम्भव नही,आज माँ का श्राद्ध है,उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं हम,माँ हमारे श्रद्धासुमन स्वीकार कर लेना।।

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वही मित्र है((विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

कह सकें हम जिनसे बातें दिल की, वही मित्र है। जो हमारे गुण और अवगुण दोनों से ही परिचित होते हैं, वही मित्र हैं। जहां औपचारिकता की कोई जरूरत नहीं होती,वहां मित्र हैं।। जाति, धर्म, रंगभेद, प्रांत, शहर,देश,आयु,हर सरहद से जो पार खड़े हैं वही मित्र हैं।। *कुछ कर दरगुजर कुछ कर दरकिनार* यही होता है सच्ची मित्रता का आधार।। मान है मित्रता,और है मनुहार। स्नेह है मित्रता,और है सच्चा दुलार। नाता नहीं बेशक ये खून का, पर है मित्रता अपनेपन का सार।। छोटी छोटी बातों का मित्र कभी बुरा नहीं मानते। क्योंकि कैसा है मित्र उनका, ये बखूबी हैं जानते।। मित्रता जरूरी नहीं एक जैसे व्यक्तित्व के लोगों में ही हो, कान्हा और सुदामा की मित्रता इसका सटीक उदाहरण है। राम और सुग्रीव की मित्रता भी विचारणीय है।। हर भाव जिससे हम साझा कर सकें और मन यह ना सोचें कि यह बताने से मित्र क्या सोचेगा?? वही मित्र है।। बाज़ औकात, मित्र हमारे भविष्य के बारे में भी हम से बेहतर जान लेते हैं। सबसे पहली मित्र,सबसे प्यारी मित्र मां होती है,किसी भी सच्चे और गहरे नाते की पहली शर्त मित्र होना है।। मित्र मजाक ज़रूर करते हैं,परंतु कटाक...

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