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तुम भी आओ हम भी आएं(( विचार स्नेह प्रेमचंद द्वारा))

*जहां चेतना कर्मों से करती है श्रृंगार*

*जहां जिजीविषा से आलिंगनबद्ध होते हैं सुविचार*

*जहां संकल्प करता है वरण सिद्धि का बार बार*

*जहां प्रतिबद्धता और प्रयास रहते हैं एक ही छत तले सपरिवार*

*जहां खुशी बन जाती है उत्सव एक नहीं हर बार*

*जहां मन में किसी के नहीं पनपते कभी विकार*

*जहां जिम्मेदारी संग मुस्कुराते हैं अधिकार*

*एक ही तो है वह स्थान
हमारा प्यार हिसार परिवार*

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